
नोएडा। सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत अब महज़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि नोएडा अथॉरिटी और बिल्डरों की वर्षों पुरानी साठगांठ का भयावह प्रतीक बन चुकी है। इस मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे उस संस्थागत भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं, जिसने नोएडा की बेशकीमती जमीन को ‘मौत के तालाबों’ में बदल दिया।
हाई कोर्ट के आदेश पर गठित एसआईटी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। ईडी ने बीते 11 महीनों में नोएडा अथॉरिटी को पांच बार पत्र लिखकर उन अधिकारियों के नाम मांगे, जिन्होंने नियम-कानून को ताक पर रखकर बिल्डरों को अनुचित लाभ पहुंचाया। इसके बावजूद अथॉरिटी के शीर्ष अधिकारियों ने एक भी पत्र का जवाब देना जरूरी नहीं समझा।
ईडी ने अपनी प्रगति रिपोर्ट में हाई कोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया है कि नोएडा अथॉरिटी जांच में सहयोग नहीं कर रही और दोषी अधिकारियों की पहचान जानबूझकर छिपाई जा रही है। अधिकारियों की पहचान के बिना न तो उनकी बेनामी संपत्तियों की जांच संभव है और न ही बिल्डरों के साथ हुए वित्तीय लेन-देन की परतें खोली जा सकती हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले ही इस पूरे प्रकरण को “भ्रष्टाचार की पाठ्यपुस्तक” करार दे चुका है।
300 एकड़ जमीन कौड़ियों के भाव, अरबों का खेल
जांच के केंद्र में 3C लोटस ग्रीन डिवेलपर्स और उसके निदेशक हैं। नोएडा अथॉरिटी ने स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के नाम पर करीब 300 एकड़ जमीन इस कंपनी को बेहद सस्ते दामों पर आवंटित की थी। शर्त थी कि 70 प्रतिशत भूमि पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
लेकिन बिल्डर ने अथॉरिटी के भ्रष्ट अफसरों से मिलीभगत कर न तो स्टेडियम बनाया, न गोल्फ कोर्स। इसके बजाय जमीन को टुकड़ों में काटकर 24 उप-कंपनियों को बेच दिया और अरबों रुपये कमाकर गायब हो गया।
अवैध खनन से बने ‘मौत के तालाब’
युवराज मेहता जिस गड्ढे में डूबे, वह सामान्य जलजमाव नहीं था। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर उठे सवालों के बाद खनन विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। आरोप है कि परियोजना की आड़ में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन किया गया।
प्रश्न यह है कि बिल्डरों को कितनी गहराई तक खुदाई की अनुमति थी और वास्तव में कितनी खुदाई की गई? इसी अवैध खनन ने इलाके को जानलेवा गड्ढों में तब्दील कर दिया।
12 हजार करोड़ की वसूली—केवल दिखावा?
हाई कोर्ट और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के बाद नोएडा अथॉरिटी ने बीते महीने करीब 12 हजार करोड़ रुपये की बकाया वसूली के लिए बिल्डरों को नोटिस भेजे। जानकारों का कहना है कि वर्षों तक आंख मूंदे रखने वाली अथॉरिटी अब सिर्फ औपचारिकता निभाकर अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रही है।
असल सवाल अब भी कायम है—जब तक दोषी अफसरों के नाम सार्वजनिक नहीं होंगे, क्या युवराज मेहता को सच में न्याय मिल पाएगा?