
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के पुनर्निर्माण और शांति व्यवस्था के लिए बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भारत को शामिल होने का न्योता भेजा है। ट्रंप से पहले पाकिस्तान और तुर्की को भी न्योता भेजा गया था। बोर्ड का उद्देश्य तबाह हुए गाजा में अस्थायी शासन स्थापित करना, उसका पुनर्निर्माण करना और हमास का निरस्त्रीकरण सुनिश्चित करना है।
वाइट हाउस ने कहा है कि बोर्ड की अध्यक्षता डोनाल्ड ट्रंप स्वयं करेंगे। इसमें टेक्नोक्रेट्स की एक फिलिस्तीनी कमेटी और एक सलाह देने वाली अंतरराष्ट्रीय समिति होगी। इस बोर्ड में शामिल होने के लिए 1 अरब डॉलर की फीस निर्धारित की गई है।
भारत के लिए दुविधा
भारत की विदेश नीति की जटिलताओं के कारण इस न्योते पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।
कंवल सिब्बल, भारत के पूर्व विदेश सचिव और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को इस बोर्ड में शामिल होने से इनकार करना चाहिए। उनका कहना है कि “भारत को ऐसी किसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, जिसे बिना संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बनाया गया हो, जिसमें संभावित दिक्कतें और निजी पार्टियों के हित शामिल हों। यह अरब मामलों को मुख्य रूप से अरब देशों को ही संभालने देना चाहिए।”
वहीं, कमर आगा, मिडिल ईस्ट और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट, का मानना है कि अमेरिका ने भारत से बात करने के बाद ही न्योता भेजा होगा। उनका कहना है कि “भारत ने हाल के समय में अपनी विदेश नीति के कई मोर्चों पर अमेरिका के साथ कदम बढ़ाया है, जिससे यह संभव है कि बोर्ड में शामिल होने के लिए न्योता भारत के लिए स्वीकार्य हो।”
सैन्य भूमिका पर सवाल
बोर्ड ऑफ पीस का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि इसमें हमास के निरस्त्रीकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) तैनात करने का प्रावधान है। कमर आगा का कहना है कि भारत अपनी शांति सेना भेजता रहा है, लेकिन अगर इसमें पाकिस्तान और तुर्की शामिल होंगे, तो भारत शायद सेना भेजने के बारे में फिर से विचार करेगा।
पाकिस्तान की तैयारी
आने वाले हफ्ते में दावोस में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात होने की संभावना है। पाकिस्तान का सेना प्रमुख असीम मुनीर भी इस दौरे का हिस्सा हो सकते हैं। पाकिस्तान अमेरिका के करीब जाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होना या नहीं होना, इस समय राजनीतिक और रणनीतिक संतुलन का एक जटिल फैसला है।