Thursday, January 15

प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट किया: भक्ति या परिवार – किसे पहले चुनें?

 

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मथुरा, ज्योति शर्मा: वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने कामकाजी और नौकरी पेशा लोगों के भक्ति से जुड़े सवालों का समाधान किया है। एक भक्त ने महाराज से पूछा कि अगर दिन भर भक्ति करते रहें और परिवार के बच्चे परेशान हों तो क्या करें। इस पर महाराज ने स्पष्ट संदेश दिया कि अपने कर्तव्य का पालन ही सच्ची भक्ति है।

 

महाराज ने कहा, “भक्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि परिवार की जिम्मेदारियों की उपेक्षा हो। चुपचाप बैठकर भजन करना भक्ति नहीं है। फावड़ा चलाइए, व्यापार कीजिए, नौकरी कीजिए और ‘राम-राम’ कहिए। अपने कर्तव्य को पूजा मानिए और उसे भगवान को समर्पित कर दीजिए। अधर्म, चोरी और हिंसा से दूर रहें।”

 

परिवार के प्रति प्रेम भी भक्ति का हिस्सा

महाराज ने कहा कि पत्नी और बच्चों से प्रेम करें, उन्हें भोजन और देखभाल दें, और अपने कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित कर दें। बीच-बीच में नाम जप भी करें। यह गृहस्थ जीवन में सच्ची भक्ति है। उन्होंने विरक्त साधकों की भक्ति से इसे अलग बताया, जिसमें भजन के अलावा कोई काम नहीं होता।

 

महाराज ने उदाहरण देते हुए कहा, “आप सुबह से शाम तक काम करते हैं। बीच-बीच में ‘राम-राम’, ‘राधा-राधा’ बोलते रहें। ऐसा करने से आपका पूरा कार्य भगवान को समर्पित हो जाता है। उदाहरण के लिए आठ घंटे काम किया, ‘कृष्णार्पणमस्तु’ कह दिया – इतना ही पर्याप्त है कि आपका कार्य भगवान के चरणों में समर्पित हो गया।”

 

मूल संदेश: धर्मपूर्वक कर्म करना ही सच्ची भक्ति है। अपने परिवार का पालन-पोषण करें और कर्मों को भगवान को अर्पित करें। इसी में जीवन का सार और भक्ति का वास्तविक अर्थ निहित है।

 

 

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