Thursday, January 15

‘डिजिटल चाबी’ को लेकर क्यों आमने-सामने हैं सरकार और स्मार्टफोन कंपनियां? सोर्स कोड विवाद की पूरी कहानी

 

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नई दिल्ली: स्मार्टफोन अब सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल पहचान और निजी जीवन की चाबी बन चुके हैं। ऐसे में इनके ‘सोर्स कोड’ को लेकर सरकार और स्मार्टफोन कंपनियों के बीच उठी खींचतान ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर सोर्स कोड है क्या और इसे लेकर इतना विवाद क्यों?

 

हाल ही में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत सरकार ने स्मार्टफोन कंपनियों से उनके सोर्स कोड साझा करने की मांग की है। हालांकि सरकार ने बाद में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया, लेकिन इस मुद्दे ने तकनीक, सुरक्षा और निजता से जुड़े कई अहम पहलुओं को चर्चा में ला दिया।

 

क्या होता है सोर्स कोड?

 

सोर्स कोड किसी भी सॉफ्टवेयर या एप्लिकेशन की बुनियादी संरचना होता है। इसे प्रोग्रामर Java, Python या C++ जैसी प्रोग्रामिंग भाषाओं में लिखते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह किसी फोन की रेसिपी या दिमाग है, जिससे तय होता है कि डिवाइस कैसे काम करेगा, डेटा कैसे प्रोसेस होगा और यूजर की जानकारी कितनी सुरक्षित रहेगी।

 

इसी सोर्स कोड के आधार पर फोन का इंटरफेस, ऐप्स की कार्यप्रणाली और सिक्योरिटी सिस्टम तैयार किया जाता है। यही वजह है कि कंपनियां इसे अपना सबसे बड़ा कारोबारी रहस्य मानती हैं।

 

विवाद की जड़ क्या है?

 

बताया जा रहा है कि सरकार डिजिटल फ्रॉड और साइबर अपराधों पर लगाम लगाने के लिए 83 नए सुरक्षा मानक तैयार कर रही है। इनमें से एक मानक के तहत स्मार्टफोन कंपनियों के सोर्स कोड की जांच की बात सामने आई। तर्क दिया गया कि कोड की जांच से उन खामियों को पकड़ा जा सकता है, जो यूजर्स की प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए खतरा बन रही हैं।

 

हालांकि आलोचकों का मानना है कि इस तरह की मांग कंपनियों और यूजर्स दोनों की निजता पर सवाल खड़े कर सकती है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी सोर्स कोड को लेकर ऐसे विवाद पहले सामने आ चुके हैं।

 

कंपनियों को क्यों है आपत्ति?

 

स्मार्टफोन कंपनियों का कहना है कि सोर्स कोड साझा करना उनके लिए भारी जोखिम है। अगर कोड लीक हुआ, तो हैकर्स आसानी से सिस्टम की कमजोरियां ढूंढ सकते हैं और बड़े साइबर हमले कर सकते हैं। साथ ही प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी उनके इनोवेशन की नकल कर सकती हैं।

 

इसके अलावा, किसी बाहरी एजेंसी को फोन के सॉफ्टवेयर तक गहरी पहुंच देना यूजर्स की प्राइवेसी के लिए भी खतरा बन सकता है।

 

आगे क्या?

 

NBT नजरिया: सरकार ने फिलहाल इस विवाद को शांत करने की कोशिश जरूर की है, लेकिन AI और एडवांस टेक्नोलॉजी के दौर में यह मुद्दा फिर उभर सकता है। AI आधारित ‘ब्लैक बॉक्स’ मॉडल्स के सोर्स कोड को समझना पहले ही मुश्किल है। ऐसे में भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सुरक्षा, निजता और कंपनियों के व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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