
नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस संभावित डील से जहां व्यापार बढ़ने और टैरिफ कम होने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में इसे लेकर गहरी चिंता भी उभर कर सामने आई है। जर्मनी की दिग्गज कार निर्माता कंपनी बीएमडब्ल्यू (BMW) ने चेतावनी दी है कि इस समझौते का फायदा उठाकर चीनी कार कंपनियां ‘बैकडोर’ से भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकती हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बीएमडब्ल्यू का कहना है कि अगर ट्रेड डील में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं रखे गए तो इससे भारत में पहले से निवेश कर चुकी कंपनियों को नुकसान हो सकता है। कंपनी ने सरकार से अपील की है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले ऑटो सेक्टर के हितों की रक्षा के लिए ठोस प्रावधान किए जाएं।
कार बाजार तक पहुंच बना अहम मुद्दा
भारत–ईयू ट्रेड डील में ऑटोमोबाइल सेक्टर एक अहम मुद्दा माना जा रहा है। जहां एक ओर यूरोपीय कंपनियां भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच चाहती हैं, वहीं उद्योग जगत को डर है कि यह समझौता यूरोप के बाहर की कंपनियों, खासकर चीनी कार निर्माताओं के लिए एक ‘लूपहोल’ खोल सकता है। इससे सस्ती कारों और इलेक्ट्रिक वाहनों की बाढ़ आने की आशंका जताई जा रही है।
BMW का तर्क और चिंता
बीएमडब्ल्यू ग्रुप इंडिया के प्रेसिडेंट और सीईओ हरदीप सिंह बरार ने कहा कि इस समझौते के तहत कम कीमत वाली कारें भारत में आसानी से आ सकती हैं। इससे उन कंपनियों को नुकसान होगा, जिन्होंने भारत में उत्पादन इकाइयों, सप्लाई चेन और रोजगार पर भारी निवेश किया है।
बरार के अनुसार, कई विदेशी बाजारों में उत्पादन लागत भारत की तुलना में अधिक है। ऐसे में अगर सस्ती गाड़ियां बिना किसी सीमा के आयात होती हैं, तो घरेलू निर्माताओं और यहां निवेश कर चुकी कंपनियों के लिए कीमत के स्तर पर मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा।
समाधान के तौर पर दिया सुझाव
इस खतरे से निपटने के लिए बीएमडब्ल्यू ने सरकार को एक ठोस सुझाव दिया है। कंपनी का कहना है कि ट्रेड डील के तहत केवल एक निश्चित कीमत से ऊपर की कारों को ही शुल्क में छूट या अन्य लाभ दिए जाएं।
हरदीप सिंह बरार ने सुझाव दिया कि यह सीमा 20,000 यूरो (करीब 21 लाख रुपये) से 30,000 यूरो (करीब 32 लाख रुपये) के बीच रखी जा सकती है। उनका मानना है कि इससे लग्जरी कार सेगमेंट को फायदा होगा, जबकि मास मार्केट और घरेलू उत्पादन पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
घरेलू कंपनियों की भी साझा चिंता
यह चिंता सिर्फ बीएमडब्ल्यू तक सीमित नहीं है। देश की कई घरेलू ऑटो कंपनियों ने भी सरकार से इस ट्रेड डील में सख्त सुरक्षा उपाय शामिल करने की मांग की है। उनका कहना है कि खासतौर पर चीनी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता इस समझौते का सहारा लेकर भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकते हैं।
इंडस्ट्री प्रतिनिधियों ने सरकार से ऊंची न्यूनतम कीमत सीमा, सीमित आयात कोटा और कड़े वैल्यू-एडिशन मानकों को समझौते में शामिल करने की अपील की है।
कुल मिलाकर, भारत–ईयू ट्रेड डील से पहले ऑटो सेक्टर में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक तरफ व्यापार बढ़ाने का अवसर है, तो दूसरी ओर घरेलू उद्योग और निवेश की सुरक्षा की बड़ी चुनौती सरकार के सामने खड़ी है।