
नई दिल्ली: अमेरिकी प्रशासन ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को अलग करने का ऐलान किया है, जिनमें भारत की अगुवाई वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) भी शामिल हैं। अमेरिका का यह कदम उन संस्थाओं से दूर जाने के रूप में देखा जा रहा है, जो उसके राष्ट्रीय हितों, आर्थिक विकास या संप्रभुता के साथ लंबे समय तक मेल नहीं खातीं।
वाइट हाउस के बयान के अनुसार, अमेरिका का यह निर्णय संयुक्त राष्ट्र (UN) के 31 और गैर-UN के 35 निकायों पर असर डालेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने कहा कि ये संगठन अमेरिकी प्राथमिकताओं के खिलाफ काम कर रहे हैं और उनके कारण राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम हो सकता है।
ISA और उसकी भूमिका
इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) का गठन भारत और फ्रांस ने 2015 में किया था। इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना, सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना और सतत विकास को बढ़ावा देना है। ISA के हेडक्वॉर्टर भारत में ही स्थित हैं। यह संगठन सहयोग, निवेश, क्षमता निर्माण और नवाचार को बढ़ावा देकर ग्लोबल सोलर मार्केट विकसित करने में मदद करता है। इसके तहत 1 ट्रिलियन डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।
ISA की स्थापना COP21-पेरिस सम्मेलन से इतर हुई थी और वर्तमान में 100 से अधिक देश इसके हस्ताक्षरकर्ता हैं, जबकि 90 से अधिक पूर्णकालिक सदस्य हैं।
IPCC और अन्य संस्थाएं
अमेरिका अब IPCC और International Renewable Energy Agency, International Union for Conservation of Nature, International Energy Forum, Global Counterterrorism Forum और Partnership for Atlantic Cooperation जैसी संस्थाओं से भी अलग हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन का अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर फोकस कमजोर हो गया है।
BRICS और अमेरिका का रुख
भारत को 1 जनवरी, 2026 से BRICS की अध्यक्षता मिल गई है, लेकिन अमेरिका इस समूह के प्रति इच्छुक नहीं दिख रहा। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में BRICS को अप्रभावी बताया और इसे अमेरिकी हितों के लिए खतरा माना।
इस फैसले के बाद वैश्विक ऊर्जा और जलवायु नीतियों पर अमेरिका के दृष्टिकोण और उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को लेकर नई बहस शुरू होने की संभावना है।