
आज जब समाज में बराबरी और लैंगिक समानता की बातें ज़ोर-शोर से की जाती हैं, तब भी बेटा-बेटी को लेकर भेदभाव की मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यह सोच केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे और आधुनिक कहलाने वाले लोगों में भी गहराई से मौजूद है। यह कहना है 30 वर्षीय वर्किंग वुमन आयुषी कुशवाहा का, जिन्होंने अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान इस मानसिकता को बेहद करीब से महसूस किया।
आयुषी बताती हैं कि जैसे ही उनके गर्भवती होने की खबर परिवार और रिश्तेदारों को मिली, बधाइयों के साथ एक जुमला बार-बार सुनने को मिला— ‘बेटी तो ठीक है, लेकिन पहली औलाद बेटा ही होना चाहिए।’ यह बात सुनकर उन्हें गहरा मानसिक तनाव झेलना पड़ा।
पहली प्रेग्नेंसी और पुरानी सोच
आयुषी के अनुसार, जब उन्होंने और उनके पति शिशिर ने परिवार को पहली बार खुशखबरी दी, तो शिशिर की दादी ने कहा— ‘भगवान एक औलाद दे दें, तो हमारे भाग्य खुल जाएं।’ आयुषी ने जब स्पष्ट किया कि यहां ‘औलाद’ से उनका मतलब बेटा है, तो जवाब मिला— ‘बेटियों से कोई दिक्कत नहीं, लेकिन अगर पहला बेटा हो जाए, तो टेंशन खत्म हो जाती है।’
यह सोच यहीं तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे यही बात परिवार के अन्य सदस्यों और यहां तक कि उनके पति तक पहुंच गई।
पति की बात ने झकझोर दिया
आयुषी बताती हैं कि एक दिन टहलते हुए उनके पति ने भी कहा कि अगर पहला बच्चा बेटा हो जाए, तो बेहतर रहेगा, क्योंकि आगे दूसरा बच्चा होगा या नहीं, यह तय नहीं है। यह बात उनके लिए सबसे ज्यादा चौंकाने वाली थी। आयुषी का कहना है कि उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं हुआ कि एक पढ़ा-लिखा, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाला व्यक्ति भी ऐसी सोच रख सकता है।
मानसिक तनाव और डॉक्टर की सलाह
इस सोच और दबाव का असर आयुषी की मानसिक सेहत पर पड़ने लगा। प्रेग्नेंसी के दूसरे ट्राइमेस्टर में जब वह नियमित जांच के लिए डॉक्टर के पास गईं, तो डॉक्टर ने उनके तनाव को तुरंत पहचान लिया। आयुषी ने परिवार और पति से मिल रहे दबाव के बारे में डॉक्टर को बताया।
डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि गर्भावस्था के दौरान मानसिक शांति बेहद जरूरी होती है। इस समय तनाव न सिर्फ मां की सेहत, बल्कि बच्चे के विकास पर भी असर डाल सकता है। उन्होंने आयुषी को सलाह दी कि वह दूसरों की सोच से खुद को अलग रखें और अपनी व बच्चे की सेहत को प्राथमिकता दें।
खुद को दी प्राथमिकता, बनीं बेटी की मां
डॉक्टर की सलाह के बाद आयुषी ने ओवरथिंकिंग पर काबू पाने का फैसला किया और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाया। उन्होंने लोगों की बातों को नजरअंदाज करना शुरू किया। आज आयुषी एक प्यारी सी बेटी की मां हैं और कहती हैं कि एक हेल्दी बच्चा ही सबसे बड़ी खुशी है—चाहे वह बेटा हो या बेटी।
डिस्क्लेमर
यह कहानी आयुषी कुशवाहा (बदला हुआ नाम) की है। पहचान गोपनीय रखने के उद्देश्य से नाम परिवर्तित किया गया है।