कानपुर। उत्तर प्रदेश में भूकंप को लेकर लापरवाही अब भारी पड़ सकती है। साल 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के झटके यूपी तक महसूस किए गए थे, जिससे प्रदेश के कई इलाकों में दहशत फैल गई थी। हालांकि उस घटना के बाद भी भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा को लेकर कोई ठोस तैयारी नहीं हो सकी। अब आईआईटी कानपुर की एक विस्तृत रिसर्च ने प्रदेश के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है। आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार यदि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में 6.5 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आता है, तो कानपुर और प्रयागराज में भारी तबाही हो सकती है। रिसर्च के मुताबिक इन दोनों शहरों की मिट्टी की संरचना ऐसी है, जो भूकंप के दौरान लिक्विफेक्शन जैसी खतरनाक प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकती है। लिक्विफेक्शन से सबसे बड़ा खतरा सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा के अनुसार कानपुर और प्रयागराज की जमीन में बालू की मात्रा अधिक है और इसके कण बेहद महीन हैं। भूकंप के तेज झटकों से मिट्टी की मजबूती कमजोर हो जाती है और जमीन के नीचे मौजूद पानी व सिल्टयुक्त बालू मिलकर ऊपर की ओर आने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को लिक्विफेक्शन कहा जाता है। इस स्थिति में जमीन का व्यवहार लगभग तरल जैसा हो जाता है, जिससे इमारतों की नींव कमजोर पड़ सकती है और बड़े-बड़े पक्के ढांचे धंस सकते हैं या गिर सकते हैं। इतिहास में भी दर्ज हुई थीं घटनाएं रिसर्च में यह भी बताया गया कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में 1803 और 1934 के बड़े भूकंपों के बाद लिक्विफेक्शन की घटनाएं दर्ज की गई थीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह क्षेत्र भूकंपीय फॉल्ट के प्रभाव क्षेत्र में भी आता है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है। 30 से 40 मीटर गहराई तक असर की संभावना आमतौर पर भूकंप के दौरान लिक्विफेक्शन का असर 8 से 10 मीटर की गहराई तक देखा जाता है, लेकिन आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार कानपुर और प्रयागराज में यह प्रभाव 30 से 40 मीटर तक जा सकता है। रिसर्च के लिए दोनों शहरों में 20-20 स्थानों से मिट्टी के नमूने लिए गए। कानपुर में गंगा बैराज के पास 70 से 80 मीटर गहराई तक बोरहोल के जरिए सैंपल इकट्ठे किए गए। इस अध्ययन में गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में भी सर्वे किया गया। इसके साथ ही लखनऊ और वाराणसी के कुछ इलाकों में भी लिक्विफेक्शन की संभावना का आकलन किया गया। सिस्मिक जोन-3 और जोन-4 में आते हैं दोनों शहर रिसर्च में बताया गया कि कानपुर और प्रयागराज सिस्मिक जोन-3 और जोन-4 में आते हैं और हिमालय से लगभग 300 किलोमीटर की परिधि में स्थित हैं। यहां की मिट्टी अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है, इसलिए निर्माण कार्य के दौरान विशेष सावधानी और आधुनिक ग्राउंड इम्प्रूवमेंट तकनीक अपनाने की जरूरत है। विशेषज्ञों की चेतावनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते शहरी नियोजन, निर्माण मानकों और भूकंपरोधी तकनीकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो भविष्य में आने वाला कोई भी बड़ा भूकंप कानपुर और प्रयागराज के लिए गंभीर तबाही का कारण बन सकता है। आईआईटी कानपुर की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों में अब भूकंप को लेकर सतर्कता और तैयारी को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो गया है।
जयपुर। बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में जांच एजेंसियों ने सख्ती बढ़ा दी है। करीब 900 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि वह विदेश फरार हो सकते हैं, इसी के मद्देनज़र यह कदम उठाया गया है।
जानकारी के अनुसार, एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 17 फरवरी को सुबोध अग्रवाल के आवास पर तलाशी ली थी, लेकिन वह मौके पर मौजूद नहीं मिले। इसके बाद से उनकी तलाश तेज कर दी गई है।
9 अफसर गिरफ्तार, कोर्ट ने 3 दिन की रिमांड मंजूर
ACB ने इस मामले में जलदाय विभाग से जुड़े नौ अधिकारियों को गिरफ्तार कर गुरुवार को अदालत में पेश किया। अदालत ने सभी आरोपियों को तीन दिन की रिमांड पर भेज दिया है। एजेंसी ने पांच दिन की रिमांड की मांग की थी, हालांकि अदालत ने सीमित अवधि ही स्वीकृत की।रिमांड के दौरान घोटाले से जुड़े दस्तावेजो...










