
रांची: कभी मिलिट्री कॉलेज के छात्र, फिर पत्रकार बने और साथी के तंज को चुनौती देते हुए IAS अधिकारी बन गए। लेकिन जीवन की यह सफल यात्रा सजल चक्रवर्ती के लिए दुखद अंत में बदल गई। चारा घोटाले के दाग ने उनके उज्ज्वल करियर और प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया।
मेधावी विद्यार्थी, लेकिन मन स्थिर नहीं
सजल चक्रवर्ती का जन्म सैन्य परिवार में हुआ। पिता और भाई सेना में उच्च पदों पर थे। रांची के संत जेवियर स्कूल से पढ़ाई के दौरान उन्हें भी सैन्य अधिकारी बनाने की कोशिश की गई। मिलिट्री कॉलेज, देहरादून में प्रवेश तो लिया लेकिन पढ़ाई में मन न लगने के कारण बीच में ही छोड़ दिया। बाद में पुणे गए, जहां पढ़ाई के साथ-साथ अखबारों में भी काम किया। रांची लौटकर उन्होंने संत जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और इसी दौरान अंग्रेजी अखबार न्यू रिपब्लिक में रिपोर्टर के रूप में काम किया। उनकी धारदार रिपोर्टिंग जल्द ही चर्चित हो गई।
सहयोगी के तंज ने IAS की राह दिखायी
अखबार में काम के दौरान एक सहयोगी ने तंज कस दिया कि क्या तुम खुद को IAS समझते हो। यह बात सजल को भली-भांति छू गई। उन्होंने UPSC की परीक्षा देने का फैसला किया और 1980 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में चयनित हो गए। पहले बिहार कैडर, बाद में झारखंड कैडर में उनका स्थानांतरण हुआ।
चाईबासा के डीसी रहते घिरे संकट में
IAS सजल चक्रवर्ती 1992-95 तक चाईबासा के डिप्टी कमिश्नर रहे। 1996 में चारा घोटाला उजागर हुआ, जिसमें उनका नाम भी आया। 1998 में पहली बार जेल गए और 18 महीने रहे। 2008 में सीबीआइ की विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और झारखंड के परिवहन सचिव पद से निलंबित कर दिया। उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी और अगस्त 2012 में झारखंड हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया।
आखिरी समय में तनहाई और निधन
सजल चक्रवर्ती 2014 में झारखंड के मुख्य सचिव बने। लेकिन सीबीआई ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 2017 में विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराकर 5 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। दो साल से अधिक जेल में रहने के बाद 2019 में उन्हें जमानत मिली। गंभीर बीमारी से जूझते हुए 2020 में बेंगलुरु में उनका निधन हो गया। अंतिम समय में उनके पास कोई भी नहीं था, परिवार, संतान या साथी के रूप में कोई साथ नहीं था।
सजल चक्रवर्ती की कहानी यह याद दिलाती है कि प्रतिभा और मेहनत भी घोटाले और परिस्थितियों के चलते बेबस हो सकती है। एक मेधावी IAS अधिकारी का जीवन, जिसे एक राज्य का मुख्य सचिव बनने का गौरव मिला, दुखद और अकेलेपन में समाप्त हो गया।
