Thursday, January 15

US Dollar Floating: डगमगाता डॉलर, चिंता में अमेरिका—क्या डूब रहा है वैश्विक अर्थव्यवस्था का जहाज?

नई दिल्ली।
जिस अमेरिकी डॉलर के दम पर अमेरिका ने दशकों तक पूरी दुनिया में अपना आर्थिक वर्चस्व कायम रखा, वही डॉलर अब सवालों के घेरे में है। अमेरिकी विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों की मानें तो डॉलर की साख में लगातार आ रही गिरावट अमेरिका के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।

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अमेरिका के प्रतिष्ठित सार्वजनिक रेडियो नेटवर्क NPR की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में डॉलर की कीमत में 9 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। यह 2017 के बाद डॉलर का सबसे खराब सालाना प्रदर्शन माना जा रहा है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि 2026 में भी डॉलर को अस्थिरता से जूझना पड़ सकता है।

स्थिति इतनी चिंताजनक है कि कुछ अमेरिकी अर्थशास्त्री यह तक कहने लगे हैं कि अमेरिका अब बांग्लादेश का रिश्तेदार बनता जा रहा है”—यानी आर्थिक मजबूती के मामले में अमेरिका का स्तर लगातार नीचे खिसक रहा है।

 

ब्याज दरों में कटौती से और कमजोर हो सकता है डॉलर

NPR की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती जारी रख सकता है। आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, ब्याज दरों में कमी आमतौर पर मुद्रा को कमजोर करती है। ऐसे में डॉलर पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।

हालांकि, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं, जो डॉलर को सीमित सहारा दे सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गिरावट जारी रह सकती है, लेकिन शायद उतनी तेज नहीं होगी जितनी पहले आशंका जताई जा रही थी। इसके बावजूद, वॉल स्ट्रीट के लिए 2026 की भविष्यवाणी करना बेहद मुश्किल हो गया है।

आज भी वैश्विक व्यापार का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में होता है, लेकिन यह हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है—जो अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है।

 

1971 की ऐतिहासिक भूल और डॉलर की अस्थिरता

Forbes में प्रकाशित एक लेख में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और Parkview Institute के अध्यक्ष जॉन टैमनी ने डॉलर की मौजूदा स्थिति के लिए सीधे तौर पर 1971 के फैसले को जिम्मेदार ठहराया है।

टैमनी के अनुसार, नोबेल विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन जैसे बाजार समर्थकों ने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को डॉलर को सोने से अलग करने के लिए राजी किया। यही वह फैसला था, जिसने डॉलर की स्थिरता को खत्म कर दिया और अस्थिरता के दौर की शुरुआत हुई।

 

70 के दशक के बाद धीमी पड़ी अमेरिका की प्रगति

लेख में कहा गया है कि 1970 के दशक के बाद से अमेरिका की आर्थिक और तकनीकी प्रगति की रफ्तार साफ तौर पर धीमी पड़ी है। चाहे वामपंथी अर्थशास्त्री रॉबर्ट गॉर्डन हों या दक्षिणपंथी विचारक पीटर थील, सभी इस बात पर सहमत हैं कि बड़े आर्थिक नवाचारों की गति पहले जैसी नहीं रही।

यह गिरावट सिर्फ आर्थिक नीतियों की नहीं, बल्कि निवेश के माहौल के कमजोर पड़ने का भी नतीजा है।

 

उपभोग नहीं, निवेश है विकास की असली ताकत

लेख में इस आम धारणा को खारिज किया गया है कि उपभोग (Consumption) ही आर्थिक विकास का इंजन है। वास्तविकता यह है कि निवेश से ही प्रगति जन्म लेती है

लोगों ने कार, रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट या स्मार्टफोन की मांग पहले नहीं की थी—इनकी मांग तब पैदा हुई, जब साहसी निवेश और नवाचार के जरिए ये चीजें अस्तित्व में आईं। यही निवेश भविष्य को गढ़ता है।

 

हर दिन 10 ट्रिलियन डॉलर का मुद्रा कारोबारक्यों?

आज दुनिया भर में हर दिन 7 से 10 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की करेंसी का लेन-देन होता है। यह विशाल आंकड़ा इस बात का सबूत है कि उत्पादकों और निवेशकों को अब भी स्थिर मुद्रा की सख्त जरूरत है।

डॉलर की अस्थिरता से बचने के लिए बाजारों में जो हेजिंग और करेंसी ट्रेडिंग हो रही है, वह असल में निवेश से ध्यान हटने का संकेत है।

 

बांग्लादेश का रिश्तेदारबनने की चेतावनी

लेख का सबसे तीखा और चौंकाने वाला निष्कर्ष यही है कि डॉलर की अस्थिरता के कारण अमेरिका दसियों ट्रिलियन डॉलर के संभावित निवेश से वंचित हो चुका है। यही वजह है कि जीवन स्तर में सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई है।

लेखक के शब्दों में,
हम पहले से बेहतर जीवन जरूर जी रहे हैं, लेकिन अगर डॉलर स्थिर होता, तो हम इससे कहीं आगे होते। अस्थिर डॉलर ने हमें बांग्लादेश के रिश्तेदार जैसा बना दिया है।”

 

निष्कर्ष

डॉलर की अस्थिरता केवल अमेरिका की समस्या नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी है। जब तक मुद्रा स्थिर नहीं होगी, निवेश कमजोर रहेगा और प्रगति की रफ्तार थमी रहेगी। सवाल यह है कि क्या अमेरिका इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की हिम्मत दिखाएगा—या फिर डॉलर का यह डूबता जहाज पूरी दुनिया को साथ लेकर नीचे जाएगा?

 

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