
नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में लगातार ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं। उनके इन कदमों से न सिर्फ अमेरिका में बल्कि पूरी दुनिया में हलचल मची हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिका वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ने का खतरा उठा रहा है।
दुनिया के कई देश अब अपने फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी घटा रहे हैं और सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी गिरकर 40% रह गई है, जो पिछले 20 साल में सबसे कम है। वहीं, सोने की हिस्सेदारी में 12% की बढ़ोतरी हुई है और यह अब 28% तक पहुँच गई है, जो 1990 के दशक की शुरुआत के बाद सबसे अधिक है।
भारत, चीन, तुर्की, पोलैंड और कजाकस्तान जैसे देशों के सेंट्रल बैंक पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय रूप से सोना खरीद रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद इस प्रवृत्ति में तेजी आई। युद्ध के दौरान अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस के विदेशों में जमा एसेट्स को फ्रीज कर दिया था। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर देश अब डॉलर पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं और सोने के भंडार को बढ़ावा दे रहे हैं।
इस बदलाव का असर सोने की कीमतों पर भी दिखा, जो पिछले साल 65% तक उछल गई, जो 1979 के बाद की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है। इसी अवधि में यूएस डॉलर इंडेक्स में 9.4% की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले 8 साल में अमेरिकी करेंसी का सबसे खराब प्रदर्शन माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप को डॉलर की घटती लोकप्रियता की जानकारी है। ब्रिक्स देशों द्वारा अपनी स्थानीय मुद्रा का उपयोग करने की योजना पर उन्होंने 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी थी।
अमेरिकी डॉलर के कमजोर होने के पीछे कई कारण हैं:
- बढ़ता अमेरिकी कर्ज
- टैरिफ और व्यापार नीतियों में लगातार बदलाव
- महंगाई की संभावनाएँ
- फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की कमजोरी दरअसल ट्रंप की रणनीति के अनुकूल है। इससे अमेरिका को आर्थिक रूप से पुनः सशक्त बनाने का उनका लक्ष्य पूरा हो सकता है।