
प्रयागराज, 1 जनवरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ की सत्र अदालत को न्यायिक कार्यवाही में जल्दबाजी दिखाने पर कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक प्रक्रियाओं में मर्यादा, संयम और धैर्य का पालन अनिवार्य है।
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि निचली अदालत सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति आने तक एक-दो दिन प्रतीक्षा करती, तो कोई समस्या नहीं होती। कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी उस समय आई, जब मेरठ सत्र अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा किए बिना आरोपियों को सामन जारी करने का आदेश पारित कर दिया था।
क्या है मामला?
मामला मुंडाली, मेरठ के चर्चित हत्याकांड से जुड़ा है। इस केस में कुछ आरोपियों के नाम पुलिस जांच के दौरान निकाल दिए गए थे, बाद में उन्हें धारा 319 के तहत दोबारा मुकदमे में शामिल करने का प्रयास किया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से उन्हें राहत भरी टिप्पणियां मिलीं।
सत्र न्यायालय को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आने की जानकारी थी, लेकिन निचली अदालत ने शीघ्रता दिखाते हुए उसी दिन आरोपियों को सम्मन जारी कर दिया।
याचिकाकर्ता की दलील
वरिष्ठ वकील विमलेन्दु त्रिपाठी ने कहा कि सत्र अदालत का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना है और न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि धारा 319 के तहत किसी आरोपी को दोबारा तलब करने के लिए ठोस साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण आवश्यक होता है, जिसे जल्दबाजी में नजरअंदाज किया गया।
वादी पक्ष का तर्क
वादी पक्ष ने कहा कि आरोपियों की भूमिका गंभीर है और उन्हें न्याय के कठघरे में लाना जरूरी था। इसके बिना दोषियों को सजा दिलाना मुश्किल होता।
हाई कोर्ट का फैसला
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा तभी बनी रहती है, जब शक्तियों का प्रयोग विवेकपूर्ण और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।
हाई कोर्ट ने सत्र अदालत का सम्मन आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा। साथ ही भविष्य के लिए न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे इस प्रकार की त्रुटियों से बचें, ताकि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता और गरिमा बनी रहे।