
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 साल पुराने एक हत्या के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए बारामूला जिले की एक बुजुर्ग महिला को जेल की सजा से मुक्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया और आरोपी की बढ़ती उम्र को देखते हुए अब सजा देना न्यायसंगत नहीं होगा। अदालत ने सजा को “पहले ही भुगती हुई” मानते हुए मामले को समाप्त करने का आदेश दिया।
यह मामला बारामूला के उरी क्षेत्र के बिझमा गांव से जुड़ा है, जहां 10 जुलाई 1979 को घरेलू विवाद के दौरान शमीमा बेगम ने अपनी सास पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया था। हमले के चार दिन बाद सास की सिर में लगी गंभीर चोटों के कारण मौत हो गई थी।
घरेलू विवाद ने लिया था हिंसक रूप
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, विवाद मक्के के खेतों में पानी देने को लेकर हुआ था। शमीमा बेगम सिंचाई करने से मना कर रही थीं, इसी दौरान उनकी सास बीच-बचाव के लिए आईं और बहस हिंसक हो गई। आवेश में आकर किए गए हमले ने एक बुजुर्ग महिला की जान ले ली।
तीन दशक चला ट्रायल, फिर 16 साल लंबित रही अपील
घटना के बाद 21 जुलाई 1979 को शमीमा बेगम को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि उसी साल अक्टूबर में उन्हें जमानत मिल गई। शुरुआत में पुलिस ने आरपीसी की धारा 326 और 324 के तहत मामला दर्ज किया, लेकिन पीड़िता की मौत के बाद आरोप धारा 302 (हत्या) में बदल दिया गया।
करीब 30 साल तक चले ट्रायल के बाद 16 जुलाई 2009 को ट्रायल कोर्ट ने शमीमा बेगम को हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 आरपीसी) का दोषी ठहराया और पांच साल की सजा सुनाई। इसके बाद उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया, लेकिन कुछ ही दिनों में फिर जमानत मिल गई।
इस फैसले के खिलाफ शमीमा बेगम ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो 16 वर्षों से अधिक समय तक लंबित रही।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि आमतौर पर मुकदमे में देरी से दोषी को लाभ नहीं दिया जाता, लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कई आरोपी दशकों तक आपराधिक न्याय प्रणाली में फंसे रहते हैं। कोर्ट ने इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया में “सिस्टमेटिक देरी” का उदाहरण बताया।
शमीमा बेगम की ओर से पेश वकील निदा नाजिर ने दलील दी कि ट्रायल और अपील दोनों स्तरों पर हुई अत्यधिक देरी ने उनके मुवक्किल के त्वरित न्याय के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया है, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।
“अब सजा का कोई औचित्य नहीं”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि घटना आवेश में की गई थी और 46 साल बाद, जब आरोपी बुजुर्ग अवस्था में है, तब उसे जेल भेजना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। इसी आधार पर सजा को रद्द करते हुए मामले को बंद कर दिया गया।