Tuesday, July 21

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ज़िंदा है अख़बार।।

अख़बारों में कुछ बचा, ज़िंदा ज़मीर आज।
तारीख़ और वार का, रखते जो अंदाज़।।

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मौत ज़मीरों की हुई, कैसी उठी पुकार।
सच को बेचें रोज़ जो, करते वही प्रचार।।

कलम हुई व्यापार की, बिकने लगे विचार।
सत्ता की चौखट तलक, झुके कई अख़बार।।

झूठ सजाकर छापते, बनकर बड़े हुज़ूर।
सच की आवाज़ें हुईं, आज बहुत ही दूर।।

टीआरपी की भूख में, मरे रोज ही लाज।
ख़बरों के बाजार में, बिकता हर अंदाज़।।

चमचे बनकर घूमते, कुछ चेहरे दिन-रात।
सच की कीमत घट गई, रचता झूठ प्रभात।।

विज्ञापन के जाल में, बिक गए समाचार।
जनता के विश्वास पर, होता रोज़ प्रहार।।

फिर भी कुछ उम्मीद की, जलती हुई मशाल।
कुछ चेहरे अब भी रखें, सच का ऊँचा भाल।।

अख़बारों में कुछ बचा, ज़िंदा ज़मीर आज।
तारीख़ और वार का, रखते जो अंदाज़।।

जो सच लिखने पर अड़े, सहते रोज़ प्रहार।
उनके दम पर आज भी, ज़िंदा है अख़बार।।

✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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