
ग्रेटर नोएडा।
नोएडा सेक्टर-150 में एक सोसाइटी के बेसमेंट में जलभराव से युवराज मेहता की मौत के बाद गौतमबुद्ध नगर की तीनों विकास प्राधिकरणों की नींद तो टूटी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—जब ये अवैध इमारतें बन रही थीं, तब जिम्मेदार अथॉरिटी कहां थी?
ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में अवैध कॉलोनियों का जाल लगातार फैलता जा रहा है। हालात यह हैं कि कॉलोनाइजर चार-पांच मंज़िला टॉवर खड़े कर देते हैं और अथॉरिटी को इसकी भनक तक नहीं लगती। जब इमारतें पूरी हो जाती हैं और उनमें लोग बसने लगते हैं, तब जाकर कार्रवाई की बात सामने आती है।
महंगे होते फ्लैट, सस्ते सपनों का लालच
ग्रेटर नोएडा में रिहायशी प्रॉपर्टी के दाम आसमान छू रहे हैं। मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर कॉलोनाइजर सस्ते फ्लैट का झांसा देते हैं। एजेंट भोले-भाले लोगों को यह भरोसा दिलाते हैं कि निर्माण अथॉरिटी से स्वीकृत है, जबकि हकीकत में किसी तरह की एनओसी नहीं ली जाती।
हैरानी की बात यह है कि यदि कोई आम नागरिक अपने घर में मामूली सा नियम उल्लंघन कर दे तो अथॉरिटी की टीम तुरंत पहुंच जाती है, लेकिन अवैध तरीके से खड़े किए गए पूरे-पूरे टॉवर वर्षों तक नजरों से ओझल बने रहते हैं।
इस तरह होती है अवैध कॉलोनियों की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, पहले किसान अथॉरिटी से आबादी के लिए जमीन छुड़वाते हैं। जहां बड़े प्लॉट होते हैं, वहां कॉलोनाइजर किसानों से जमीन खरीद लेते हैं और बिना किसी वैध अनुमति के निर्माण शुरू कर देते हैं। कई मामलों में अधिसूचित क्षेत्र में भी बिना जमीन मुक्त कराए निर्माण कर दिया जाता है।
कार्रवाई से पहले पहुंच जाती है खबर
जब भी अथॉरिटी अवैध निर्माण पर कार्रवाई की तैयारी करती है, उसकी सूचना पहले ही कॉलोनाइजरों तक पहुंच जाती है। यह जानकारी कैसे लीक होती है, यह भी जांच का विषय है। सूचना मिलते ही कॉलोनाइजर मौके से गायब हो जाते हैं।
इन इलाकों में सबसे ज्यादा अवैध निर्माण
ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी क्षेत्र के खेड़ा चौगानपुर, वेदपुरा, सैनी, सादुल्लापुर, सुनपुरा, अच्छेजा और दादरी से सटे इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हो रहा है। कई टॉवरों में लोग रह भी रहे हैं। कॉलोनाइजर सीवर, पानी और बिजली जैसी सुविधाओं का वादा करते हैं, लेकिन हकीकत में सीवेज व्यवस्था फेल हो जाती है और गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है।
ऐसे इलाकों में अब कार्रवाई करना ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है, लेकिन सवाल यही है कि क्या किसी और हादसे के बाद फिर से ‘जागने’ का इंतजार किया जाएगा?