
रेसलिंग के दुनिया में अपनी ताकत और सख्ती के लिए मशहूर पहलवान संग्राम सिंह दिखने में सख्त जरूर हैं, लेकिन दिल से बेहद भावुक हैं। मां और बड़ी बहन सुनीता के प्रति उनके प्रेम और सम्मान की कहानियां उनके जीवन के उन पहलुओं को उजागर करती हैं, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती हैं।
संग्राम सिंह कहते हैं, “बच्चों को संस्कार घर से मिलते हैं, इसलिए घर का माहौल सही होना जरूरी है। मेरा बचपन रोहतक, हरियाणा के एक किसान परिवार में बीता। हमारे घर में कभी भाई-बहन में कोई भेदभाव नहीं किया गया। मेरी दीदी को हमसे ज्यादा प्यार मिला। मां और दीदी ने मुझे बड़े प्यार से पाला और महिलाओं का सम्मान करना सिखाया।”
वे आगे बताते हैं, “महिलाओं का समाज में बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन इसकी अहमियत को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। मां और दीदी ने मुझे दूसरों के लिए जीना और प्यार का महत्व समझाया। वे सरल दिखती हैं, लेकिन भीतर से बेहद मजबूत हैं। उन्होंने मुझे सिखाया कि बिना शोर किए कैसे खामोशी से काम किया जाता है।”
संग्राम का कहना है कि आज दुनिया की कोई भी चीज़ खरीद सकते हैं, लेकिन घर जैसा खाना कहीं नहीं मिलता। दिल्ली में काम के दौरान भी उनकी दीदी उन्हें घर का खाना भेजती हैं।
संग्राम की दीदी सुनीता उनके लिए मां समान हैं। बचपन में संग्राम रूमेटाइटिस और आर्थराइटिस जैसी तकलीफों से जूझ रहे थे। दीदी ने हर दर्द में उनका ख्याल रखा, और गांव के अन्य लड़कों से उन्हें बचाया। शादी के बाद भी उनका स्नेह कम नहीं हुआ। एक बार संग्राम किसी मुसीबत में फंस गए, तो दीदी ने अपने गहने बेचकर उन्हें उस संकट से बचाया। संग्राम इसे एक महिला के त्याग का उदाहरण मानते हैं और कहते हैं, “ऐसा त्याग केवल एक महिला ही कर सकती है। इसलिए हमें महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।”
संग्राम सिंह की यह कहानी न केवल उनके व्यक्तिगत अनुभवों का आईना है, बल्कि यह समाज को यह याद दिलाती है कि संस्कार, स्नेह और सम्मान की शिक्षा घर से ही शुरू होती है।