
नई दिल्ली: देश की सभी अदालतों में हर मुकदमे में एक साल के भीतर फैसला सुनाने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने इसे ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ बताते हुए कहा कि न्यायालय को बाहरी कैमरों के लिए प्लेटफ़ॉर्म नहीं बनाया जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सोमवार, 19 जनवरी, 2026 को याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कमलेश त्रिपाठी से कहा कि अगर उन्हें न्यायिक सुधारों के सुझाव हैं तो वे सीधे प्रशासनिक तौर पर पत्र भेज सकते हैं।
सीजेआई ने दिये स्पष्ट निर्देश:
बेंच ने याचिका के इरादे पर सवाल उठाते हुए कहा कि “एक साल में हर मुकदमे का फैसला” जैसे निर्देश कैसे लागू किए जा सकते हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “देश में बदलाव चाहते हैं तो याचिका दायर करने की जरूरत नहीं, आप मुझे पत्र लिख सकते हैं। बाहर खड़े कैमरे के सामने बोलने के लिए याचिका मत डालिए।”
न्यायिक सुधारों के लिए विकल्प:
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक सुझाव देने के लिए याचिकाकर्ता सीधे पत्र भेज सकते हैं। बेंच ने कहा कि ऐसे सुझावों का स्वागत किया जाएगा, लेकिन इसे न्यायालय के सामने सार्वजनिक शोकेस बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
इस पीआईएल में याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि देश में लंबित मामलों को नियंत्रित करने और न्याय व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सभी अदालतों में मुकदमों का निपटान एक साल में किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे औपचारिक याचिका के बजाय पब्लिसिटी स्टंट करार दिया।