Saturday, January 17

अपने फायदे के लिए भारत का भी नुकसान कर रहा चीन, ड्रैगन की डंपिंग नीति क्यों बनी जी का जंजाल?

चीन अपने उत्पादों को भारत समेत कई देशों में बेचने के लिए डंपिंग नीति का सहारा ले रहा है, जिससे भारतीय उद्योगों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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चीन की डंपिंग नीति और उसका असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के बाद चीन की आर्थिक स्थिति कुछ कमजोर हुई है। अमेरिका में अपने सामान की बिक्री घटने के कारण चीन ने नए बाजारों की ओर रुख किया। इसका सबसे बड़ा लक्ष्य है अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करना और अपने उत्पादों को अन्य देशों में आसानी से खपाना।

चीन ने अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए युआन मुद्रा को कमजोर किया और कई वस्तुओं की कीमतें घटा दीं। इसका सीधा असर भारत पर पड़ा है। देश की GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी घटकर लगभग 14% रह गई है। इसके जवाब में भारत ने केमिकल्स, इलेक्ट्रिकल स्टील्स और अन्य कुछ उद्योगों पर कड़े शुल्क लगाए हैं।

विश्व स्तर पर बढ़ रही चिंता
चीन की इस रणनीति के खिलाफ 120 से अधिक व्यापारिक जांच चल रही हैं। जापान, कनाडा, मेक्सिको और थाईलैंड ने टैरिफ लगाना शुरू कर दिया है। चीन की डंपिंग नीति से यूरोप के देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और जापान के उद्योगों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा पूर्वी यूरोप और अफ्रीका के बाजारों में सस्ते चीनी उत्पादों की होड़ ने स्थानीय उद्योगों को मुश्किल में डाल दिया है।

भारत और यूरोप की चुनौतियाँ
यूरोप में चीन पेंट, प्लास्टिक, पेपर, टेक और ऑटो इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं डंप कर रहा है। इसके कारण यूरोपीय संघ (EU) ने भारत और चीन से आने वाले बेरियम कार्बोनेट पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लागू कर दी है। चीन के लिए यह ड्यूटी 83.9% तक है, जबकि भारतीय सप्लायर्स के लिए यह 4.6% है। इसका असर कांच, सिरेमिक और अन्य उद्योगों के बाजार में महसूस किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत ने समय रहते कड़े कदम न उठाए, तो घरेलू उद्योगों को और गंभीर नुकसान हो सकता है। ऐसे में चीन की डंपिंग नीति केवल उसके लिए नहीं, बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए भी चुनौती बनती जा रही है।

 

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