Tuesday, January 13

वकालत से उपराष्ट्रपति तक का सफर, एम्स में भर्ती राजस्थान के इस ‘लाल’ की कहानी

 

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झुंझुनूं के छोटे से किठाना गांव से निकलकर देश के दूसरे सर्वोच्च पद तक पहुँचने वाले जगदीप धनखड़ फिलहाल एम्स दिल्ली में भर्ती हैं। सैनिक स्कूल के मेधावी छात्र रहे धनखड़ ने पहले वकालत में अपनी पहचान बनाई और बाद में राजनीति में लंबी छलांग लगाई। सांसद, केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल के बाद वे उपराष्ट्रपति बने। स्वास्थ्य कारणों के चलते पिछले साल जुलाई में उन्होंने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था।

 

शेखावाटी का गौरव, उपराष्ट्रपति बने धनखड़

जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को झुंझुनूं जिले के किठाना गांव में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में हुई। पांचवीं तक गांव में पढ़ाई करने के बाद मीडिल के लिए घरधाना के स्कूल में दाखिला लिया। कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना उनकी मेहनत और लगन का परिचायक था। वर्ष 1962 में उन्हें सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ में मेरिट स्कॉलरशिप के साथ दाखिला मिला। बाद में महाराजा कॉलेज जयपुर से बीएससी और राजस्थान विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री पूरी की।

 

वकालत में खास पहचान, संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों में विशेषज्ञ

1979 में राजस्थान बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराने के बाद धनखड़ वकील बने। संवैधानिक, खनन और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मामलों में उनका नाम विख्यात हुआ। वे राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट के रूप में जाने जाते हैं।

 

राजनीति में कदम, सांसद और मंत्री बने

राजनीतिक सफर उन्होंने जनता दल से शुरू किया। 1989 में झुंझुनूं लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसी दौरान चंद्रशेखर सरकार में उन्हें संसदीय मामलों का केंद्रीय राज्य मंत्री बनने का मौका मिला। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और 1993 में अजमेर जिले की किशनगढ़ विधानसभा सीट से विधायक बने।

 

भाजपा में राजनीतिक बुलंदी, राज्यपाल और उपराष्ट्रपति बने

2008 में भाजपा में शामिल होने के बाद वे संगठन में सक्रिय रहे। 2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल नियुक्त हुए। जुलाई 2022 तक राज्यपाल रहने के बाद भाजपा ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। चुनाव में उन्हें 74.4 प्रतिशत वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस की मारग्रेट अल्वा को बड़े अंतर से हराया।

 

फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से एम्स में भर्ती जगदीप धनखड़ डॉक्टरों की निगरानी में हैं। पिछले साल उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में कम ही दिखाई दिए और अधिकतर समय आराम करते रहे।

 

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