
पटना/दिल्ली: बिहार के राम स्वरूप की हत्या का 26 साल पुराना मामला हाल ही में दिल्ली की अदालत में समाप्त हुआ। सबूतों की कमी के कारण अदालत ने दो आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि तीसरा आरोपी विजय, जो राम स्वरूप का साला भी है, अब तक फरार है।
राम स्वरूप 1999 में रोजगार के लिए दिल्ली गए थे और वहां एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करने लगे थे। अक्टूबर 1999 में उन्हें उत्तमनगर, मतियाला क्षेत्र के एक बंद गोदाम में मशीन के नीचे मृत पाया गया।
शुरुआती जांच में फैक्ट्री मालिक पप्पू यादव और मजदूर सकिंदर कुमार, विजय यादव और मोंटू यादव पर संदेह जताया गया। मोंटू को 2010 में इस मामले में बरी कर दिया गया था। करीब 26 साल बाद अदालत ने भी पप्पू यादव और सकिंदर को हत्या, साजिश और सबूत मिटाने के आरोपों से बरी कर दिया।
कोर्ट का निर्णय और कारण
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दीपक वासन ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों को हत्या से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं कर सका। गवाहों की गवाही में भी विसंगतियां थीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोष तय करना मुश्किल है।
राम स्वरूप के भाई चंदू यादव के अनुसार, राम स्वरूप और विजय दिल्ली काम करने गए थे, लेकिन 25 दिन बाद विजय और अन्य आरोपी अपने गांव लौट गए, जबकि राम स्वरूप वापस नहीं लौटा।
अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण सबूतों की कमी और गवाहों की असंगतियों के कारण अभियोजन पक्ष का मामला अविश्वसनीय बन गया। 26 साल पहले हुई इस हत्या के बावजूद राम स्वरूप के परिवार को न्याय नहीं मिल सका।