
ईरान इन दिनों गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश में पिछले कुछ समय से इस्लामी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं। सरकारी दमन में अब तक 500 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है। वहीं, अमेरिका की तरफ से ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी ने स्थिति और गंभीर बना दी है।
ईरान की करेंसी और महंगाई पर असर
ईरान की आर्थिक हालत पहले ही नाजुक है। देश की मुख्य आय का स्रोत कच्चा तेल है, लेकिन पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के कारण इसकी बिक्री और कीमत पर गहरा असर पड़ा है। भारतीय रुपये के मुकाबले ईरानी रियाल की कीमत अब लगभग 11,000 है, जबकि डॉलर के मुकाबले यह बढ़कर 14 लाख रियाल तक पहुंच गया है।
1979 की इस्लामी क्रांति के समय एक अमेरिकी डॉलर 70 ईरानी रियाल के बराबर था। आज, यह मूल्य करीब 20,000 गुना गिर चुका है। इस गिरावट के पीछे पश्चिमी प्रतिबंध, महंगाई और कूटनीतिक अलगाव प्रमुख कारण हैं।
IRGC का कब्जा और पारदर्शिता की कमी
ईरान की अर्थव्यवस्था में इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड (IRGC) और इस्लामी संगठनों का बड़ा प्रभाव है। ये संगठन टैक्स नहीं देते और न ही पारदर्शी वित्तीय हिसाब-किताब रखते हैं। IRGC केवल एक सैन्य बल नहीं, बल्कि देश की इंडस्ट्री, ऊर्जा, बंदरगाह और दूरसंचार क्षेत्रों में सक्रिय एक समानांतर शक्ति केंद्र है।
तेल उद्योग पर पश्चिमी प्रतिबंधों का असर
देश के सबसे बड़े रेवेन्यू स्रोत – तेल उद्योग – को भी प्रतिबंधों की मार झेलनी पड़ रही है। ईरान को तेल बेचने के लिए अक्सर बिचौलियों और शैडो फ्लीट टैंकरों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे तेल की कीमतें कम हो जाती हैं। मार्च 2025 तक ईरान ने तेल निर्यात से करीब 23.2 बिलियन डॉलर कमाए, जबकि लीगल तरीकों से यह राशि 28 बिलियन डॉलर से अधिक हो सकती थी।
गरीबी और GDP पर असर
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2020 के बीच ईरान की प्रति व्यक्ति GDP में औसतन 0.6% की गिरावट आई। इसी दौरान लगभग 1 करोड़ लोग गरीबी में चले गए। अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले ईरानियों का हिस्सा 20% से बढ़कर 28.1% हो गया।
ईरान की GDP में सर्विस सेक्टर का हिस्सा 47%, इंडस्ट्री का 40% और कृषि का 12.5% है। देश का कुल GDP 2025 में अनुमानित 356.5 अरब डॉलर है, जबकि उसका डिफेंस बजट मात्र 9.9 अरब डॉलर है। इसके विपरीत, अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसका डिफेंस बजट 1.5 ट्रिलियन डॉलर है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका ईरान में सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह लंबे समय तक ईरान के लिए टिकाऊ नहीं हो सकता। हालाँकि, देश की कमजोर इकॉनमी और बढ़ती महंगाई इसे गंभीर संकट में डाल रही है।