
गांव से निकलकर अफसर बनने का सपना हर किसी का नहीं होता, लेकिन मंतशा खान ने अपनी मेहनत, धैर्य और अनुशासन से इसे सच कर दिखाया। लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने कदम नहीं रोके और अर्जुन की तरह लक्ष्य साधने का आदर्श अपनाकर अपने सपनों को हकीकत में बदला।
गांव से शुरुआत
मंतशा मध्य प्रदेश के देवास जिले के छोटे से गांव कानडा की रहने वाली हैं। उनकी मां टीचर हैं और शुरुआती पढ़ाई उन्होंने गांव के स्कूलों से ही की। 12वीं तक उत्कृष्ट अंक पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की क्योंकि उनका मानना था कि आगे का रास्ता तभी खुलेगा जब आधार मजबूत होगा।
2020 में शुरू हुआ सफर
ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद 2020 में मंतशा ने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी। गांव में रहते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य को स्पष्ट कर लिया था और उसी दिशा में मेहनत शुरू कर दी।
तीन बार मिली असफलता, पर हार नहीं मानी
पहले प्रयास में 2020 में मेंस परीक्षा में असफलता मिली। 2021 में फिर से मेंस तक पहुँची लेकिन सफलता नहीं मिली। तीसरी बार 2022 में प्रीलिम्स में असफल होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
पिता की प्रेरणा: अर्जुन का उदाहरण
तैयारी के दौरान जब भी मंतशा निराश होतीं, उनके माता-पिता उन्हें प्रोत्साहित करते। पिता गीता के श्लोक पढ़कर उन्हें अर्जुन की तरह लक्ष्य साधने की प्रेरणा देते। इस मोटिवेशन ने उन्हें लगातार प्रयास करते रहने की ताकत दी।
एक ही महीने में 2 इंटरव्यू, गांव की पहली अधिकारी
2023 में मंतशा को पहली बार इंटरव्यू देने का अवसर मिला। लगातार मेहनत के बाद 2024 में उन्हें MPPSC का इंटरव्यू बैक टू बैक देने का मौका मिला। इस प्रयास में उन्होंने रैंक-2 हासिल कर वाणिज्यिक कर निरीक्षक (Commercial Tax Inspector) की पोस्ट पर कार्यभार संभाला। इसके साथ ही वह अपने गांव की पहली महिला अधिकारी बनीं और परिवार का नाम रोशन किया।
मंतशा की कहानी यह साबित करती है कि सपनों की दिशा सही हो और मेहनत लगातार हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। उनकी सफलता युवाओं के लिए प्रेरणा और हौंसले की मिसाल है।