Thursday, January 8

आलोक राज: कानून के लिए लड़ते रहे, न डरे न झुके और आखिरकार जीत गए

 

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पटना: आईपीएस आलोक राज का नाम कर्तव्यनिष्ठा और साहस के पर्याय के रूप में लिया जाता है। वे ऐसे अधिकारी हैं जो व्यवस्था को सुधारने के लिए न केवल राज्य सरकार के आला अधिकारियों, बल्कि पूरे सत्ताधारी दल से टकराने का माद्दा रखते हैं।

 

2008 का नंदीग्राम कांड: साहस और निष्पक्षता का प्रमाण

 

साल 2008 में आलोक राज सीआरपीएफ के डीआईजी पद पर नंदीग्राम में तैनात थे। पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा की आशंका को देखते हुए उन्हें निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने का जिम्मा दिया गया था। उस समय पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की वाम मोर्चा सरकार थी और स्थानीय पुलिस पर पक्षपात का आरोप था।

 

आलोक राज ने निर्देशों का पालन करते हुए शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित किया। उन्होंने किसी के दबाव या सरकारी हस्तक्षेप से प्रभावित हुए बिना अपना कर्तव्य निभाया।

 

झूठे आरोपों के बावजूद डटे रहे

 

स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाए, जिसमें महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसी गंभीर बात शामिल थी। लेकिन आलोक राज ने कहा, “मुझे किसी भी झूठे आरोप की परवाह नहीं, स्वतंत्र जांच हो और सत्य सामने आए।” उन्होंने स्थानीय पुलिस और सांसदों के दबाव के बावजूद निष्पक्ष चुनाव संचालन जारी रखा।

 

क्लीन चिट और सच्चाई की जीत

 

सीआरपीएफ की जांच में आलोक राज को पूरी तरह निर्दोष पाया गया। उनके खिलाफ लगे सभी आरोप बेबुनियाद साबित हुए। सीआरपीएफ के महानिदेशक ने भी कहा कि आलोक राज ने अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ निभाया।

 

अंततः साहस की जीत

 

नंदीग्राम कांड आलोक राज के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और कानून के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने दिखाया कि सच्चाई और कर्तव्य का रास्ता कभी हारता नहीं, चाहे कितनी भी राजनीतिक ताकतें विरोध करें।

 

 

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