
पटना: बिहार विधानसभा के बजट सत्र में राजनीति गरमा गई है। राजद विधायक कुमार सर्वजीत द्वारा पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के लिए ‘बेचारा’ शब्द का इस्तेमाल विवाद का केंद्र बन गया। लोजपा (रामविलास) सदस्यों ने सदन में हंगामा करते हुए नारों के साथ विरोध दर्ज कराया। सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया।
यह पहली बार नहीं है जब लालू यादव की पार्टी ने रामविलास पासवान का अपमान किया हो। 2013 में लालू यादव के चारा घोटाला मामले में सजा मिलने के बाद और जेल जाने के दौरान, रामविलास पासवान का धैर्य परीक्षा में पड़ा। लालू यादव की उस गलती का असर उन्हें लंबे समय तक भुगतना पड़ा। 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में लोजपा लगातार राजद से बड़ी पार्टी बनी।
लालू यादव से क्यों अलग हुए थे रामविलास पासवान?
2002 में गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले रामविलास पासवान ने भाजपा से कभी न जाने का संकल्प लिया था। लेकिन 2013 में लालू यादव के व्यवहार ने उन्हें मजबूर कर दिया। लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर लालू यादव ने लोजपा को केवल 3 सीटें देने का प्रस्ताव रखा, जिससे रामविलास पासवान आहत हुए।
चिराग पासवान का निर्णायक कदम
इस समय रामविलास पासवान के समक्ष विकल्प था – संकल्प बनाए रखना या पार्टी को बचाना। चिराग पासवान की राजनीति की समझ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन पर भरोसा उन्हें भाजपा के साथ आने के लिए राजी कर गया।
NDA में एलजेपी की बढ़ती ताकत
एलजेपी का एनडीए में शामिल होना बिहार राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। 7 में से 6 लोकसभा सीटें जीतकर लोजपा राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। लालू यादव और नीतीश कुमार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
सीनियर नेता रामविलास पासवान का योगदान
रामविलास पासवान बिहार की राजनीति में वर्षों तक एक निर्णायक नेता रहे। 1969 में विधायक बनने के बाद वे लगातार बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बने। उनके योगदान को नकारना या उनकी आलोचना करना राजद के लिए महंगा साबित हुआ।
निष्कर्ष: ‘बेचारा’ शब्द का विवाद सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि पिछले राजनीतिक फैसलों की याद दिलाता है। लालू यादव की पुरानी भूलें आज भी उनके और राजद के लिए परिणाम ला रही हैं।
