
नई दिल्ली: राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दिल्ली बॉर्डर पर वसूले जाने वाले एमसीडी टोल और एनवायरमेंट कंपनसेशन चार्ज (ECC) में संशोधन की सिफारिश की है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने तर्क दिया है कि मौजूदा दरें वर्षों से स्थिर हैं, जिससे उनका प्रभाव कम हो गया है और दिल्ली से होकर गुजरने वाले भारी वाहनों को रोकने का उद्देश्य कमजोर पड़ गया है।
आयोग के मुताबिक, फिलहाल एक खाली टू-एक्सल ट्रक को दिल्ली में प्रवेश के लिए करीब 700 रुपये चुकाने होते हैं, जबकि पेरिफेरल एक्सप्रेसवे पर यही सफर अधिक महंगा पड़ता है। ऐसे में ट्रक ऑपरेटर दिल्ली के भीतर से गुजरना ज्यादा लाभदायक समझते हैं, जिससे राजधानी में ट्रैफिक और प्रदूषण का दबाव बढ़ता है। CAQM का मानना है कि शुल्कों का पुनरीक्षण करने से बाहरी रूट का उपयोग बढ़ेगा और शहर के भीतर प्रदूषण घटाने में मदद मिलेगी।
तकनीकी खामियों पर भी चिंता
हलफनामे में टोल वसूली की तकनीकी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जहां लाखों वाहन RFID के जरिए भुगतान कर रहे हैं, वहीं रियल-टाइम मॉनिटरिंग और ऑटोमेटेड नंबर प्लेट पहचान प्रणाली पूरी तरह प्रभावी नहीं है। आयोग ने सुझाव दिया है कि अक्टूबर 2026 तक दिल्ली के सभी 126 टोल प्लाजा पर बैरियर-फ्री, RFID आधारित मल्टीलेन सिस्टम लागू किया जाए ताकि ट्रैफिक बिना रुके गुजर सके।
शुल्क स्थगन से बढ़ सकता है दबाव
कमिटी ने चेतावनी दी है कि नई प्रणाली लागू होने तक यदि ECC को निलंबित किया गया तो दिल्ली से गुजरने वाले वाहनों की संख्या और बढ़ सकती है, जिससे भीड़भाड़ और प्रदूषण की समस्या गंभीर हो जाएगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का भी कहना है कि ECC और टोल दरों का समय-समय पर पुनरीक्षण जरूरी है, ताकि राजधानी में प्रवेश बाहरी एक्सप्रेसवे की तुलना में महंगा बना रहे।
ECC फंड के उपयोग पर सवाल
दिल्ली में वसूले गए एनवायरमेंट कंपनसेशन चार्ज के उपयोग पर भी सवाल उठ रहे हैं। दिसंबर 2025 तक ECC के रूप में करीब 1,753 करोड़ रुपये जमा हुए, लेकिन इनमें से केवल 781 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। यानी 55 प्रतिशत से अधिक राशि अब तक उपयोग में नहीं लाई जा सकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब हर सर्दी में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है, तो इस फंड का प्रभावी और पारदर्शी इस्तेमाल बेहद जरूरी है।