Tuesday, May 26

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भारत-ईयू फ्री ट्रेड डील से घबराया तुर्की, विशेषज्ञों ने जताई आर्थिक नुकसान की चेतावनी

 

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अंकारा/दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने लगभग दो दशक लंबी बातचीत के बाद फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप दे दिया है। दोनों पक्ष मंगलवार, 27 जनवरी को इस ऐतिहासिक समझौते की औपचारिक घोषणा करेंगे। यह समझौता यूरोप और भारत के लिए नई आर्थिक संभावनाओं के द्वार खोलेगा, लेकिन इसके चलते कुछ देशों में चिंता भी बढ़ गई है, जिनमें तुर्की प्रमुख है।

 

तुर्की की सरकार और व्यापार विशेषज्ञों ने इस डील के संभावित नकारात्मक प्रभावों को लेकर चेतावनी दी है। तुर्की दशकों से यूरोपीय संघ के साथ कस्टम्स यूनियन में बंधा हुआ है, जिससे वह अन्य देशों के साथ होने वाले नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स में सीधे भाग लेने में असमर्थ है।

 

तुर्की के व्यापार विश्लेषकों का कहना है कि भारत और ईयू के बीच समझौता तुर्की को अपने प्रमुख वैश्विक बाजारों में पिछड़ने का खतरा पैदा कर सकता है। तुर्की के व्यापार मंत्री उमर बोलाट ने कहा है कि कुछ ईयू देशों के विरोध की वजह से तुर्की-ईयू कस्टम्स यूनियन का आधुनिकीकरण अब तक नहीं हो पाया है।

 

तुर्की निर्यातक संघ (TIM) के प्रमुख मुस्तफा गुल्टेपे ने कहा, “ईयू बाजार में तुर्की की लंबी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कमजोर हो रही है। भारत विशेषकर केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव और रक्षा क्षेत्र में तुर्की के लिए चुनौती बन सकता है। इसके अलावा रेडीमेड कपड़े और टेक्सटाइल जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में भारत से मुकाबला करना मुश्किल होगा।”

 

तुर्किश इंडस्ट्री एंड बिजनेस एसोसिएशन (TUSIAD) के जर्मनी प्रतिनिधि अल्पर उकोक ने बताया कि यह समझौता भू-आर्थिक दृष्टि से भी तुर्की के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि इससे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के भविष्य का रास्ता साफ हो सकता है, जिसमें तुर्की शामिल नहीं है।

 

इकोनॉमिक डेवलपमेंट फाउंडेशन (IKV) के अध्यक्ष आयहान जेतिनोग्लू ने चेतावनी दी, “तुर्की को संरचनात्मक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि ईयू तेजी से अपने FTA नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। फिलहाल तुर्की के पास 24 देशों के साथ FTA हैं, जबकि ईयू के पास 80 देशों के साथ व्यापार और भागीदारी समझौते हैं। यह हालात तुर्की-ईयू कस्टम्स यूनियन के सुधार की जरूरत को और बढ़ा देते हैं।”

 

विशेषज्ञों का मानना है कि एर्दोगन सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वह तुर्की को वैश्विक व्यापार में पिछड़ने से बचाए और कस्टम्स यूनियन के सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए।

 

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