
नई दिल्ली/तेल अवीव: भारत में रहने वाले बनेई मेनाशे यहूदी समुदाय के 3,300 सदस्यों को इज़राइल भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन उनका जाने का समय अभी तय नहीं हो सका है। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मंजूरी के बाद भारत में यहूदी जनजातियों की स्क्रीनिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। दिसंबर 2025 में आइजोल और कोलासिब में कैंप लगाकर इन आवेदकों का इंटरव्यू किया गया और शॉर्टलिस्ट किया गया।
इंटरव्यू प्रक्रिया सीधे इज़राइली सरकार द्वारा संचालित की गई थी, जिसमें 25 सदस्यों वाला प्रतिनिधिमंडल शामिल था। टीम का नेतृत्व इज़राइल के अलियाह और एब्जॉर्प्शन मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर-जनरल रैंक के अधिकारी ने किया। यह पहला मौका था जब एक दशक के अंतराल के बाद इतनी बड़ी संख्या में इंटरव्यू आयोजित किए गए। पिछली बार 2015 में हुए इंटरव्यू के बाद प्रवासियों का आखिरी बैच 2021 में “शावेई इज़राइल” योजना के तहत इज़राइल गया था।
इंटरव्यू में शामिल आवेदक मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के कुकी समुदाय से थे। आवेदकों को आइजोल लाने के लिए 10 घंटे की खतरनाक पहाड़ी यात्रा करनी पड़ी, जिसमें 10 मिनीबस और SUVs का उपयोग किया गया। मिजोरम पुलिस ने सुरक्षा प्रदान की और डेयानिम—रैबिनिकल जज ने उम्मीदवारों की जांच की।
34 वर्षीय आसफ रेंथले, जो सेंट स्टीफंस कॉलेज के पूर्व छात्र और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से MPhil डिग्रीधारी हैं, इस बैच में शामिल थे। वहीं 65 वर्षीय नादव हौहनार और उनकी पत्नी 62 वर्षीय याफा, जो आइजोल के बीचों-बीच चार मंजिला घर के मालिक हैं, भी चयनित हुए। अधिकांश परिवारों के कई सदस्य पहले से ही इज़राइल में रह रहे हैं।
इज़राइल जाने में देरी क्यों?
बनेई मेनाशे समुदाय का इज़राइल जाना कभी भी आसान नहीं रहा। यह कहानी 1950 के दशक में शुरू हुई, जब मिजो समुदाय के मेला चाला ने दावा किया कि मिजो लोग इज़राइल की खोई हुई यहूदी जनजातियों के वंशज हैं। उनकी रीति-रिवाज और यहूदी परंपराओं के बीच समानताओं ने इस विश्वास को और मजबूत किया।
2005 में इज़राइल के मुख्य रब्बी ने औपचारिक रूप से बनेई मेनाशे को यहूदी मान्यता दी। इसके बाद से इज़राइल वापस लाने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन लगातार प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण प्रक्रिया में देरी हो रही है।
माना जा रहा है कि इज़राइल लगातार आंतरिक और बाहरी संघर्षों में व्यस्त होने के कारण यह प्रक्रिया धीमी पड़ रही है। बनेई मेनाशे समुदाय के लोग इस बीच अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी और पारंपरिक कार्यों में व्यस्त हैं, लेकिन उनके लिए इज़राइल का सपना अब भी जीवित है।