
सारण: बिहार की राजनीति में कई बार देखा गया है कि एक बंद दरवाजा कभी किसी बड़े अवसर का मार्ग खोल देता है। ऐसी ही कहानी है भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की। अगर नीतीश कुमार ने कभी रूडी का टिकट काटा न होता, तो शायद वह आज राष्ट्रीय राजनीति में इस मुकाम तक नहीं पहुँच पाते।
तरैया से शुरू हुई राजनीति
राजीव प्रताप रूडी अमनौर के जमींदार परिवार से आते हैं। उनके पिता बिहार सरकार में उच्च अधिकारी थे। राजनीति में कदम रखने से पहले रूडी पटना के एएन कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाते थे और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से उनकी निकटता थी। 1990 में उन्हें जनता दल का टिकट मिला और वे सिर्फ 26 साल की उम्र में तरैया सीट से विधायक बने।
सवर्ण छात्रों के आंदोलन में समर्थन
1990 में लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद मंडल आयोग के लागू होने से अगड़े और पिछड़े वर्गों में तनाव बढ़ा। जनता दल के भीतर अघोषित विभाजन हुआ। इस दौरान रूडी और आनंद मोहन ने सवर्ण छात्रों का समर्थन किया, जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई।
नीतीश कुमार की ‘ना’ ने खोला रास्ता
1995 के विधानसभा चुनाव में रूडी को समता पार्टी का टिकट नहीं मिला, जिसे उन्होंने अपनी बड़ी निराशा माना। लेकिन इसी निराशा ने उनके लिए नए अवसर का द्वार खोल दिया। 1996 में भाजपा ने उन्हें छपरा (सारण) से लोकसभा उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में उन्होंने जनता दल के लाल बाबू राय को हराकर सांसद बनने का रास्ता तय किया। 1999 में फिर से छपरा से सांसद चुने गए और अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिपरिषद में वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री बने।
लालू परिवार की दो बड़ी शख्सियतों को हराया
राजीव प्रताप रूडी की जनसमर्थन की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लालू परिवार की दो महत्वपूर्ण नेताओं, राबड़ी देवी (2014) और रोहिणी आचार्य (2024) को सारण में हरा कर इतिहास रचा। यह खास इसलिए भी है क्योंकि इन चुनावों में लालू यादव ने खुद इनकी जीत के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी।
राजीव प्रताप रूडी की यह यात्रा साबित करती है कि कभी-कभी किसी दरवाजे का बंद होना ही भविष्य में बड़ी सफलता की शुरुआत बन जाता है।