
अमेरिका ने हाल ही में ग्रीनलैंड पर अपनी पकड़ बढ़ाने की इच्छा जताई है, जिससे दुनिया के कई देशों, खासतौर पर यूरोप में हलचल मच गई है। डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ज़ोर देकर कहा है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है।
ग्रीनलैंड का राजनीतिक और भौगोलिक महत्व
ग्रीनलैंड अटलांटिक महासागर में स्थित दुनिया के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है। यह पिछले 300 सालों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है। 1979 में इसे स्वायत्ता दी गई, जिसमें ग्रीनलैंड को आंतरिक मामलों में निर्णय लेने का अधिकार मिला, लेकिन विदेश नीति, रक्षा और आर्थिक मामलों का नियंत्रण अभी भी डेनमार्क के पास है। नाटो के सदस्य होने के कारण, ग्रीनलैंड को सुरक्षा का आश्वासन भी मिला है।
ग्रीनलैंड की आबादी लगभग 57 हजार है, जिसमें अधिकांश मूलनिवासी हैं। यहां की प्रति व्यक्ति जीडीपी 58,499 अमेरिकी डॉलर है, और कुल जीडीपी 3.33 अरब डॉलर है।
अमेरिका की ग्रीनलैंड पर दावेदारी के तीन प्रमुख कारण
- राष्ट्रीय सुरक्षा
ग्रीनलैंड यूरोप और उत्तर अमेरिका के बीच में स्थित है और आर्टिक क्षेत्र तथा नॉर्थ अटलांटिक महासागर के पास है। इसकी यह भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए सैन्य और सुरक्षा दृष्टि से बेहद अहम है। चीन और रूस के बढ़ते सैन्य प्रभाव को देखते हुए अमेरिका इस क्षेत्र में अपने दबदबे को और मजबूत करना चाहता है। - आर्थिक लाभ
ग्रीनलैंड में लिथियम, तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण इन संसाधनों तक पहुंच पहले से आसान हो रही है। अमेरिका इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों के लिए लिथियम पर चीन पर निर्भर है, जिसे कम करने के लिए ग्रीनलैंड में निवेश करना चाहता है। - भूराजनीतिक दबदबा
ग्रीनलैंड पर नियंत्रण होने से अमेरिका अंतरिक्ष, समुद्र और हवाई क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम कर सकता है। यह ट्रांसअटलांटिक गठबंधन और नाटो की रणनीति में भी अहम भूमिका निभाएगा।
हालांकि, डेनमार्क और अन्य नाटो सहयोगी देशों ने चेतावनी दी है कि बल प्रयोग कर ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की योजना गठबंधन को संकट में डाल सकती है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संसाधन और भू-राजनीतिक दबदबे के कारण अमेरिका ग्रीनलैंड पर अपनी नजर बनाए हुए है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चुनौतियों और तनाव की संभावना पैदा कर सकता है।