
नई दिल्ली: रूस ने अब सिर्फ तेल और ऊर्जा तक सीमित नहीं रहकर भारत को अपने गैर-ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के लिए प्रमुख साझेदार के रूप में देखना शुरू कर दिया है। दोनों देश अब इंजीनियरिंग, जहाज निर्माण, आईटी, रिन्यूएबल एनर्जी, रिफाइनिंग और मेटलर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
रूस के व्यापार प्रतिनिधि आंद्रेई सोबोलेव ने कहा कि मॉस्को के विदेश आर्थिक एजेंडे में भारत प्राथमिकता में है। उन्होंने बताया कि रूसी कंपनियां भारत में उत्पादन के लोकलाइजेशन और दक्षिण एशियाई व तीसरे देशों के बाजारों में विस्तार के अवसर तलाश रही हैं।
इस रणनीति का महत्व उस समय और बढ़ गया है, जब अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं। कुल 50% टैरिफ में 25% रूसी तेल आयात शामिल है। ऐसे में रूस भारत को किसी भी तरह से अमेरिका के प्रभाव में जाने से रोकना चाहता है।
दोनों देशों ने उत्तरी समुद्री मार्ग के विकास पर भी चर्चा की है। यह आर्कटिक महासागर में 5,600 किलोमीटर लंबा मार्ग रूस के यूरोपीय और पूर्वी बंदरगाहों को जोड़ता है और लॉजिस्टिक्स व व्यापार के नए अवसर खोलता है।
अजय सहाय, FIEO के महानिदेशक, ने कहा कि भारत रूस को अपने माल और सेवाओं का निर्यात दोगुना करके 10 अरब डॉलर तक पहुंचाने की योजना बना रहा है। उन्होंने बताया कि 2030 तक दोनों देशों का ट्रेड टर्नओवर 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य है। इसके तहत यांत्रिक इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, पर्यटन, डिजिटल सेवाएं, फिनटेक और ग्रीन एनर्जी जैसी नई क्षेत्रीय संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच तकनीकी, औद्योगिक और लॉजिस्टिक सहयोग को भी मजबूत करेगी।