Saturday, January 3

मथुरा का पारंपरिक स्वाद पहुंचा राष्ट्रीय मंच पर ‘लाफ्टर शेफ’ में छाया रूपा कचौड़ी का बृज रस, सेलिब्रिटी शेफ भी हुए मुरीद

 

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कान्हा की नगरी मथुरा केवल अपनी धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट और पारंपरिक खान-पान के लिए भी विश्वविख्यात है। इसी परंपरा को राष्ट्रीय पहचान दिलाते हुए मथुरा की ऐतिहासिक रूपा कचौड़ी ने कलर्स टीवी के लोकप्रिय शो ‘लाफ्टर शेफ’ में अपनी खास मौजूदगी दर्ज कराई। शो के मंच पर जैसे ही देसी घी में बनी पारंपरिक कचौड़ी की खुशबू फैली, वहां मौजूद मशहूर शेफ और बॉलीवुड कलाकार इसके स्वाद के कायल हो गए।

 

विश्राम घाट स्थित रूपा कचौड़ी की पारंपरिक विधि और वर्षों पुरानी रेसिपी का जब शो में प्रदर्शन हुआ, तो दर्शकों के साथ-साथ सेलिब्रिटी मेहमानों ने भी जमकर सराहना की। कई कलाकारों ने मथुरा आकर स्वयं इस ऐतिहासिक स्वाद का आनंद लेने की इच्छा जाहिर की।

 

व्यापारियों और बृजवासियों में हर्ष

 

रूपा कचौड़ी का राष्ट्रीय टेलीविजन पर पहुंचना मथुरा के स्थानीय व्यापारियों और बृजवासियों के लिए गर्व का विषय बन गया है। वर्षों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों की पहली पसंद रही इस दुकान ने अब देशभर में अपनी पहचान बना ली है। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि इस उपलब्धि से मथुरा के पर्यटन और स्थानीय व्यवसाय को नई दिशा और गति मिलेगी।

 

स्थानीय व्यापारी केशव सैनी ने कहा,

“यह हमारे पूरे जिले के लिए गौरव का क्षण है। जब मथुरा की कोई पहचान राष्ट्रीय मंच पर सराही जाती है, तो इससे छोटे व्यापारियों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।”

 

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम

 

विश्राम घाट पर प्रतिदिन उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि रूपा कचौड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि मथुरा की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। टीवी शो में कचौड़ी के साथ-साथ बृज की मेहमाननवाज़ी, खान-पान की परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रमुखता से दर्शाया गया, जिससे करोड़ों दर्शकों तक मथुरा की सकारात्मक छवि पहुंची।

 

18 पीढ़ियों की विरासत

 

रूपा कचौड़ी का इतिहास लगभग 18 पीढ़ियों पुराना है। संचालकों के अनुसार, उनका परिवार पीढ़ियों से इस पारंपरिक व्यवसाय को संभालता आ रहा है। वे अपनी कचौड़ी को ‘आयुर्वेदिक हींग वाली कचौड़ी’ के रूप में पहचान दिलाते हैं। खास बात यह है कि कचौड़ी हमेशा ‘युगल’ के रूप में परोसी जाती है—दो कचौड़ी एक साथ—जो राधा-कृष्ण की युगल परंपरा का प्रतीक मानी जाती है।

 

राष्ट्रीय मंच पर मिली यह पहचान न केवल रूपा कचौड़ी के लिए, बल्कि पूरे मथुरा और बृज क्षेत्र के लिए गौरव और सम्मान का विषय बन गई है।

 

 

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