
पूर्णिया, बिहार: जन्म से दोनों हाथों से वंचित होने के बावजूद रूपम कुमारी ने अपने हौंसले और मेहनत से जीवन की हर चुनौती को पार किया। बिहार के एक छोटे गांव में पली-बढ़ी रूपम ने पैरों से लिखना सीखकर अपनी पढ़ाई जारी रखी और कठिन परीक्षाओं में सफलता हासिल की।
2009 में उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की। इसके बाद उच्च शिक्षा में भी उनका संघर्ष जारी रहा। NET परीक्षा पास करने के बाद वह अब भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। पीएचडी पूरी होने के बाद रूपम के नाम के आगे ‘डॉक्टर’ का खिताब जुड़ जाएगा।
शादीशुदा रूपम अपने परिवार का साथ देने के साथ-साथ अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती हैं। उनका पति भी एक प्राइवेट शिक्षक हैं और रूपम की शिक्षा व सफलता में उनका पूरा समर्थन है।
रूपम कुमारी की कहानी दिखाती है कि असली ताकत हाथ-पैरों में नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और हिम्मत में होती है। उनकी संघर्ष से सफलता की यात्रा समाज के सभी लोगों के लिए प्रेरणा और साहस की मिसाल है।