Saturday, July 25

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ग्रीन स्टील उत्पादन होगा किफायती, स्वच्छ बिजली और ग्रीन हाइड्रोजन से घटेगी लागत: रिपोर्ट

नई दिल्ली | सद्वार्ता

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भारत में ग्रीन स्टील का उत्पादन भविष्य में महंगा नहीं होगा, यदि स्वच्छ बिजली (कार्बन-मुक्त ऊर्जा) और ग्रीन हाइड्रोजन को एकीकृत योजना के तहत अपनाया जाए। यह दावा वैश्विक शोध संस्था TransitionZero की नई रिपोर्ट में किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत के इलेक्ट्रिक और गैस आधारित इस्पात संयंत्रों में 70 प्रतिशत समय कार्बन-मुक्त बिजली तथा 20 प्रतिशत ग्रीन हाइड्रोजन मिश्रण का उपयोग किया जाए, तो स्टील उत्पादन लागत में केवल लगभग 3 प्रतिशत की वृद्धि होगी। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी और यूरोपीय संघ के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) जैसे अंतरराष्ट्रीय नियमों से जुड़े जोखिम भी कम होंगे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब तक स्वच्छ बिजली और ग्रीन हाइड्रोजन को अलग-अलग समाधान के रूप में देखा जाता रहा है, जबकि दोनों का संयुक्त उपयोग अधिक प्रभावी और किफायती साबित हो सकता है। अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा, जो कई बार उपयोग न होने के कारण व्यर्थ चली जाती है, उसका इस्तेमाल ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में किया जा सकता है। इससे सौर ऊर्जा की बर्बादी (सोलर कर्टेलमेंट) में 90 प्रतिशत तक कमी संभव है।

TransitionZero की हेवी इंडस्ट्री लीड वेरिटी क्रेन के अनुसार, भारत का मौजूदा 43 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य इस्पात क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को पूरी तरह नहीं दर्शाता। उनका कहना है कि चौबीसों घंटे कार्बन-मुक्त बिजली अपनाने से घरेलू कोयले पर निर्भरता घटेगी, जबकि ग्रीन हाइड्रोजन आयातित गैस की आवश्यकता कम करेगा। यदि दोनों तकनीकों की योजना एक साथ बनाई जाए, तो ग्रीन स्टील आर्थिक रूप से और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक है और आने वाले वर्षों में स्टील की मांग में लगातार वृद्धि होने का अनुमान है। ऐसे में इस्पात उद्योग का डीकार्बोनाइजेशन देश के जलवायु लक्ष्यों और टिकाऊ औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि ग्रीन स्टील केवल नई तकनीक अपनाने का विषय नहीं, बल्कि ऊर्जा प्रणाली की समन्वित और दूरदर्शी योजना का परिणाम है। यदि नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और बिजली ग्रिड को साथ लेकर विकसित किया जाए, तो कम-कार्बन स्टील उत्पादन पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी व्यवहारिक और लाभकारी साबित हो सकता है।

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