

कोलकाता:
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव के बाद Suvendu Adhikari ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या उन्हें राज्य चलाने की पूरी स्वतंत्रता मिलेगी या फिर वे केवल केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए दिखाई देंगे।

राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि बंगाल जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य में शुभेंदु अधिकारी की असली परीक्षा अब शुरू होगी। चुनावी जीत हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि अवश्य है, लेकिन जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना उससे कहीं अधिक कठिन चुनौती माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुभेंदु अधिकारी वास्तव में बंगाल की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं, तो उन्हें केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय राज्य के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। सबसे पहले उन्हें उन उद्योगों और कंपनियों को दोबारा जीवित करने की दिशा में काम करना होगा, जिन्होंने वर्षों पहले पश्चिम बंगाल से अपना कारोबार समेट लिया था।
राज्य में नए उद्योगों, कंपनियों और निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार को प्रभावी और आकर्षक औद्योगिक योजनाएं लानी होंगी। यदि बंगाल में बड़े स्तर पर उद्योग स्थापित होते हैं, तो रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और राज्य के युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
पिछले कई वर्षों से बेरोजगारी और पलायन बंगाल की बड़ी समस्याओं में शामिल रहे हैं। बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दिल्ली जैसे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए हैं। ऐसे में नई सरकार से जनता को उम्मीद है कि वह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को प्राथमिकता देगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शुभेंदु अधिकारी ने लगातार दो बार Mamata Banerjee को चुनावी मैदान में हराकर अपनी राजनीतिक क्षमता साबित कर दी है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी राह अब भी आसान नहीं होगी। उन्हें विपक्ष के मजबूत दबाव, जनता की अपेक्षाओं और केंद्र तथा राज्य के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल को केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित रखते हैं या वास्तव में उसे औद्योगिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से नई दिशा देने में सफल साबित होते हैं।


