
नई दिल्ली: वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट का विश्लेषण करने पर साफ हो रहा है कि सरकार ने विकास के नाम पर सामाजिक क्षेत्रों को नजरअंदाज किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति और आवास जैसे अहम क्षेत्रों में खर्च में लगातार कमी आई है, जबकि खास वर्गों को लाभ पहुंचाने वाले सेक्टरों पर अधिक ध्यान दिया गया है।
सामाजिक क्षेत्रों पर वास्तविक खर्च घटा
विशेषज्ञों के अनुसार, स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो GDP का मात्र 0.5% है। सरकार पहले भी कह चुकी है कि स्वास्थ्य पर खर्च 2.5% तक होना चाहिए। इसी तरह शिक्षा पर खर्च केवल GDP का 0.6% रखा गया है, जबकि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के अनुसार इसे 6% होना चाहिए। जलजीवन मिशन में पिछले साल 67,000 करोड़ का आवंटन था, लेकिन केवल 17,000 करोड़ ही खर्च हुए। शहरी और ग्रामीण आवास योजनाओं का हाल भी इसी तरह रहा।
रोजगार और कृषि क्षेत्र की अनदेखी
बजट में रोजगार पैदा करने वाले सेक्टरों और कृषि क्षेत्र पर भी खर्च घटाया गया है। देश की 46% आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन पिछले साल की तुलना में इस बार केवल 628 करोड़ रुपये अधिक आवंटित किए गए हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं के प्रशासनिक बदलावों से वास्तविक लाभ पहले से कम हो जाएगा।
कराधान और असमानता
सरकार की आमदनी का बड़ा हिस्सा आम लोगों से मिलने वाले इनकम टैक्स से आता है (21%), जबकि कॉरपोरेट टैक्स से केवल 18% राजस्व मिलता है। आय में यह असमानता और बढ़ रही है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत के 10% लोग देश की कुल आमदनी का 58% ले जाते हैं, जबकि 50% आबादी के हिस्से में केवल 15% आता है।
विशेषज्ञों की राय
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने पहले ही चेतावनी दी थी कि केवल विकास दर पर ध्यान देने से समस्या हल नहीं होगी। इस बजट में यही समस्या दिखाई दे रही है।
निष्कर्षतः, बजट में खास वर्गों पर ध्यान देने और सामाजिक कल्याण, रोजगार व कृषि जैसे आम लोगों के हितों की अनदेखी ने आम नागरिकों के लिए चिंताजनक संकेत दिए हैं।