
नई दिल्ली, 14 जनवरी 2026: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए साल का पहला मिशन एक बड़ी चुनौती लेकर आया। PSLV-C62 रॉकेट तकनीकी खराबी के कारण अपने निर्धारित मार्ग से भटक गया, जिससे इसमें सवार 16 उपग्रह और अन्य पेलोड प्रभावित हुए। यह मिशन भारत की राष्ट्रीय कूटनीति और अंतरिक्ष क्षेत्र में उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षा दोनों के लिए अहम माना जा रहा था।
असफलता से मिलने वाले सबक
स्पेस मिशन में असफल होना कोई नई बात नहीं है। ISRO, NASA, SpaceX और चीन-रूस जैसे देशों के अनुभव बताते हैं कि अंतरिक्ष अनुसंधान inherently जोखिम भरा है। असफलताओं से मिलने वाला डेटा और सीख ही आगे आने वाली सफलताओं की नींव बनती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विफलताओं की ईमानदारी से जांच, गलतियों से सीख और सिस्टम सुधार ही ISRO को भविष्य में मजबूत बनाएंगे।
भरोसे और सुरक्षा पर असर
PSLV रॉकेट लंबे समय से ISRO का सबसे भरोसेमंद लॉन्च वाहन माना जाता रहा है। लेकिन लगातार दो मिशनों की विफलता से अंतरिक्ष क्लाइंट हिचक सकते हैं। आज के प्रतिस्पर्धी स्पेस मार्केट में ISRO को केवल पुरानी साख पर निर्भर नहीं रहना होगा।
इस मिशन में कई उपग्रह नष्ट हुए हैं, जिनमें DRDO का एक अहम रक्षा पेलोड भी शामिल था। इससे भारत की निगरानी, खुफिया और सुरक्षित संचार क्षमताओं पर असर पड़ा है। विशेषकर क्षेत्रीय सुरक्षा हालात को देखते हुए, इस तरह की क्षमताओं में तेजी से सुधार की जरूरत है।
अभियानों और निजी भागीदारी पर असर
हर असफलता ISRO के अभियानों को महीनों या वर्षों के लिए पीछे धकेल देती है। रिप्लेसमेंट सैटेलाइट के निर्माण और लॉन्च के लिए फंड मंजूरी की प्रक्रिया, निर्माण और नई लॉन्च तारीखें तय करना समय लेने वाला कार्य है। इसके अलावा, भारत में निजी लॉन्च स्टार्टअप्स की शुरुआत हो रही है, लेकिन अभी उनकी क्षमता जरूरी मिशनों की तुरंत भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस जिम्मेदारी का मुख्य भार अभी भी ISRO पर ही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विफलताओं को केवल नुकसान के रूप में देखने के बजाय उन्हें सीखने और सुधार की प्रक्रिया के रूप में अपनाना ISRO की भविष्य की सफलता की कुंजी होगी।