
नई दिल्ली: जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ट्ज भारत की दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार को नई दिल्ली पहुंचे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत-जर्मनी संबंधों को और मजबूत करना और दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौतों (MoUs) और एफटीए को अंतिम रूप देना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मर्ट्ज की मौजूदगी में कई समझौता ज्ञापनों पर साइन किए गए। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब डॉलर के पार चला गया है, जो अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। मर्ट्ज के साथ भारत में बड़ी कंपनियों के अधिकारी भी आए हैं, जिनमें सीमेंस (Siemens) और एयरबस (Airbus) के प्रतिनिधि शामिल हैं।
एफटीए और निवेश बढ़ावा
मर्ट्ज ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप देने के महत्व पर जोर दिया। उनका कहना है कि यह समझौता भारत-जर्मनी आर्थिक संबंधों की पूरी क्षमता को उजागर करेगा। इसके जरिए जर्मन कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा सकेंगी और भारतीय कंपनियां यूरोप में अपना व्यापार विस्तार कर सकेंगी।
पनडुब्बी निर्माण पर चर्चा
जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (Thyssenkrupp Marine Systems) भारतीय नौसेना के लिए छह पनडुब्बियां बनाने पर बातचीत कर रही है। ये पनडुब्बियां भारत की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (Mazagon Dock Shipbuilders) के साथ मिलकर बनाई जाएंगी। हालांकि, इस यात्रा के दौरान सौदे पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन बातचीत से प्रगति की संभावना है। यह सौदा भारत की पुरानी रूसी पनडुब्बियों को बदलने में मदद करेगा।
भारत जर्मनी व्यापार और चीन की कमी
भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 50 अरब यूरो (करीब 5.27 लाख करोड़ रुपये) का है। भारत की विशाल आबादी जर्मन निर्यातकों के लिए विकास के बड़े अवसर प्रदान करती है।
पिछले कुछ सालों में चीन में जर्मन कंपनियों की बिक्री घट गई है और चीन से कुछ प्रमुख सामग्री की आपूर्ति पर बैन लगा दिया गया है। इसके चलते जर्मनी अब भारत को अपना महत्वपूर्ण आर्थिक विकल्प मान रहा है। जर्मन कंपनियां भारत में निवेश बढ़ाकर चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं।
जर्मनी और भारत की यह व्यापारिक साझेदारी न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से भी दोनों देशों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है।