
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार जांच कर रहे संसदीय पैनल की वैधता को चुनौती दी थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली बेंच ने सवाल उठाया कि अगर राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति उनके कार्य कर सकते हैं, तो राज्यसभा के सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति उनके कार्य क्यों नहीं कर सकते।
जस्टिस वर्मा की ओर से मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार देता है। उपसभापति को यह अधिकार नहीं है। हालांकि, उपसभापति सामान्य कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं।
कोर्ट ने अधिनियम की परिभाषा संबंधी धाराओं पर गौर करते हुए कहा कि ‘जब तक संदर्भ अन्यथा न हो’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिससे उपसभापति की भूमिका पर बहस खुली रहती है।
जस्टिस वर्मा केस का विवरण
14-15 मार्च 2025 की रात दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में आग लगने के दौरान फायर सर्विस ने स्टोर रूम से जले हुए नोटों की गड्डियां बरामद की थीं। उस समय जस्टिस वर्मा बंगले में नहीं थे। जांच में यह कैश अनएकाउंटेड पाया गया।
इस घटना के एक हफ्ते बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर किया गया, जहां फिलहाल कोई न्यायिक कार्य उन्हें सौंपा नहीं गया है।