Thursday, January 8

क्या भारत स्कूलों में ऑस्ट्रेलिया जैसा नियम लाएगा? बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई से बढ़ी चिंता

 

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कोविड महामारी के बाद से स्कूलों में बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई में वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता भी बढ़ गई है। बच्चे अब न केवल पढ़ाई के लिए, बल्कि सोशल मीडिया से भी जुड़ रहे हैं। यह समस्या सीबीएसई की कई पहल के बावजूद बनी हुई है, जिनका प्रभाव अब तक सीमित नजर आ रहा है।

 

बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई और बढ़ता स्क्रीन टाइम

 

भारत सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय सहित कई एजेंसियां इस समस्या से निपटने के लिए विभिन्न नीतियों पर काम कर रही हैं। इन नीतियों का उद्देश्य एक सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह साइबरस्पेस तैयार करना है, जहां बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। वहीं, शिक्षा मंत्रालय भी बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर गंभीर है और इस पर लगातार निगरानी रख रहा है।

 

सीनियर अधिकारियों का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और इसके लिए कई पहल की गई हैं। आजकल बच्चे मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार को राज्य सरकारों और स्कूलों के लिए गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए, ताकि बच्चों के साइबर उपयोग को नियंत्रित किया जा सके।

 

क्या ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून भारत में लाना चाहिए?

 

हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने यह व्यवस्था दी कि केंद्र सरकार बच्चों द्वारा इंटरनेट का उपयोग नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाने पर विचार कर सकती है, जैसा कि आस्ट्रेलिया में लागू है। कोर्ट ने कहा कि जब तक ऐसा कोई कानून लागू नहीं होता, तब तक राज्य और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों में बाल अधिकारों और इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए योजनाएं तैयार कर सकता है।

 

ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट रखने से रोका जाता है, जिससे बच्चों पर सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके। करियर काउंसलर आलोक बंसल का कहना है कि अब समय आ गया है जब बच्चों पर सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के उपायों पर विचार किया जाए।

 

बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई से जुड़ी चिंताएं

 

कभी किताबों में पढ़ाई करने वाले बच्चे अब मोबाइल पर ही अपना होमवर्क करने लगे हैं। कई बार तो बच्चे होमवर्क के नाम पर अपने पेरेंट्स से मोबाइल लेते हैं और फिर सोशल मीडिया पर व्यस्त हो जाते हैं। यह स्थिति गंभीर होती जा रही है, क्योंकि इसका बच्चों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

 

अतः इस समस्या का समाधान निकालने के लिए सरकार को स्कूलों को सख्त गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए। मौजूदा स्थिति में बच्चों का स्क्रीन टाइम अधिक हो रहा है, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।

 

सीबीएसई की पहल का असर नहीं दिख रहा

 

सीबीएसई ने कोविड महामारी के बाद ऑनलाइन पढ़ाई के शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक प्रभावों को कम करने के लिए कुछ पहल की हैं। इनमें स्क्रीन टाइम को कम करने, सुरक्षित डिजिटल शिक्षा सुनिश्चित करने, और छात्रों में स्वस्थ ऑनलाइन आदतें बढ़ाने के लिए साइबर सुरक्षा पुस्तिका शामिल है।

 

इसके अलावा, स्कूलों को साइबर जागरूकता दिवस मनाने और साइबर क्लब स्थापित करने की भी सलाह दी गई है, लेकिन इन पहलों का असर अब तक सीमित ही रहा है। अधिकांश स्कूल अब भी होमवर्क भेजने के लिए मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

 

 

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