

विदिशा/गुणायतन, 22 जुलाई (सद्वार्ता)। गुणायतन के विशाल परिसर में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में आयोजित नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक साधना के वातावरण में निरंतर आगे बढ़ रहा है। अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस महाआयोजन में सहभागी बन रहे हैं।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि 320×160 फीट के विशाल विधान मंडप में एक साथ 108 मंडलों में श्रीजी विराजमान हैं। श्रद्धालु भगवान की आराधना करते हुए अब तक 16 अर्घ समर्पित कर चुके हैं, जबकि विधान के तीसरे दिन 32 अर्घ अर्पित किए जाएंगे। विदिशा से अविनाश जैन, मुकेश जैन बड़ाघर, इंजीनियर चंद्रशेखर, प्रद्युम्न सिंघई सहित सैकड़ों परिवार धर्माराधना कर पुण्य लाभ अर्जित कर रहे हैं।
अपने प्रवचन में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन में आत्मपरिवर्तन लाना है। उन्होंने कहा कि यदि विधान के बाद व्यक्ति की भाषा, व्यवहार, भावनाएं और दृष्टिकोण सकारात्मक रूप से बदल जाएं, तभी आराधना सार्थक मानी जाएगी।
उन्होंने कहा कि भगवान की पूजा केवल मंत्रोच्चारण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और शुद्ध भाव से की गई आराधना ही जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाती है। पूजा के समय मनुष्य को स्वयं को भूलकर पूर्ण एकाग्रता और भक्ति के साथ भगवान की आराधना करनी चाहिए।
मुनिश्री ने बताया कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान नौ पदों की आराधना का महान आध्यात्मिक विधान है, जिसमें पंच परमेष्ठी, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र और सम्यक् तप का गहन संदेश निहित है। इन सिद्धांतों को केवल सुनना नहीं, बल्कि जीवन में आत्मसात करना ही सच्ची साधना है।
उन्होंने कहा कि यदि इस विधान के पश्चात अहंकार कम हो, क्रोध शांत हो, लोभ और स्वार्थ का त्याग हो तथा जीवन में शांति, सरलता और समता का विकास हो, तभी विधान सफल माना जाएगा। केवल धार्मिक आयोजन में भाग लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारना आवश्यक है।
मुनिश्री ने श्रद्धा से सिद्धि तक की आध्यात्मिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि “श्रद्धा से भावना, भावना से आराधना, आराधना से साधना और साधना से सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।” उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अष्टान्हिका महापर्व को केवल नौ दिनों का आयोजन न मानकर आजीवन आत्मशुद्धि और आत्मविकास का माध्यम बनाएं।
उन्होंने कहा कि साधारण जीवन को असाधारण बनाने की शक्ति भक्ति में निहित है। यदि भक्ति गहरी होगी तो जीवन भी उत्कृष्ट बनेगा। आराधना केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि अंतर्मन की निर्मल भावना से की जानी चाहिए।
प्रवचन के अंत में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने सभी मंडलधारकों एवं श्रद्धालुओं को मंगलाशीष प्रदान करते हुए कहा कि प्रत्येक धार्मिक कार्य भावपूर्वक करें, क्योंकि “भाव के बिना क्रिया फलवती नहीं होती।” उन्होंने सभी से श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान को आत्मपरिवर्तन, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का महापर्व बनाने का आह्वान किया।


