आत्मा में कर्मबन्ध की शुरुआत मन, वचन और काय से होती है, इसलिए पाप करने से पहले डरें : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
मधुवन। (सद्वार्ता) श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के पाँचवें दिवस राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाणसागर महाराज ने कर्मबन्ध के सूक्ष्म विज्ञान का सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से विवेचन करते हुए कहा कि आत्मा में कर्मबन्ध की प्रक्रिया मन, वचन और काय की प्रत्येक प्रवृत्ति से प्रारंभ होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को हर क्षण सजग और सावधान रहना चाहिए तथा जीवन में "पाप करने से डरो, पाप करके मत डरो" के सिद्धांत को अपनाना चाहिए।
गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि मुनिश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक महान कार्य सुविचारित योजना और क्रमबद्ध प्रक्रिया से पूर्ण होता है। इसी प्रकार श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और आत्मशुद्धि का महान साधना-पर्व है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य के प्रत्येक भाव, विचार और कर्म से आत्मा में स्पंदन ...

