स्त्रीवाचक शब्द और पितृसत्ता: भाषा से बराबरी की लड़ाई
नई दिल्ली: हिंदी भाषा में स्त्रीवाचक शब्दों के उपयोग और उनकी आवश्यकता पर बहस लंबे समय से चल रही है। आधुनिक युग में जहां महिलाएँ शिक्षा, राजनीति, खेल और हर पेशे में पुरुषों के साथ बराबरी कर रही हैं, वहां भाषा का पुराना ढांचा पितृसत्तात्मक नजर आता है। ‘बल्लेबाजिनी’, ‘निवेशिका’, ‘सैनिका’ जैसे नए शब्दों का प्रयोग कुछ अखबारों में शुरू हुआ, लेकिन सवाल उठता है: क्या इन शब्दों से समाज में वास्तविक समानता आएगी, या यह केवल भाषाई खेल बनकर रह जाएगा?
भाषा बनाम समाजहिंदी का व्याकरण स्पष्ट है। “वह अच्छा डॉक्टर है” या “वह अच्छी डॉक्टर है” से ही स्पष्ट हो जाता है कि बात पुरुष की है या महिला की। इंदिरा गांधी या द्रौपदी मुर्मु के लिए कभी ‘प्रधानमंत्राणी’ या ‘राष्ट्रपतिनी’ नहीं लिखा गया, फिर भी उन्हें सम्मान मिला। पद, पद ही रहता है – अध्यक्ष, संपादक, विधायक – पुरुष या महिला के लिए समान रूप से प्रयुक्त होता...










