Tuesday, June 2

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गोवा के चर्चों में बदलती तस्वीर हिंदी में होने लगी प्रार्थना, प्रवासी समुदाय की ज़रूरत ने बदली परंपरा

पणजी।
गोवा में हिंदी भाषी समुदाय की संख्या लगातार बढ़ने के साथ अब चर्चों में भी भाषाई बदलाव दिखाई देने लगा है। जहां पहले प्रार्थना सभा केवल अंग्रेजी या कोंकणी में होती थी, वहीं अब कई चर्चों में हिंदी मास आम हो गए हैं। बदलाव की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी, जब जेसुइट पादरियों ने पहली बार हिंदी में मास करवाया। 2025 आते-आते यह पहल व्यापक रूप ले चुकी है।

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‘अपनी भाषा में प्रार्थना का सुकून’

झारखंड से गोवा आई शोभा कुजूर, जो अंग्रेजी नहीं समझती थीं, बताती हैं कि पहले प्रार्थना सभा में बैठने भर से उन्हें अर्थ समझ में नहीं आता था।
वह कहती हैं,
“अपनी भाषा में भगवान का संदेश सुनने जैसा सुकून कहीं नहीं।”

कैरान्जालेम स्थित आवर लेडी ऑफ द रोजरी चर्च सहित कई चर्चों में अब हिंदी मास शुरू हो चुके हैं, जिससे प्रवासी समुदाय को बड़ी राहत मिली है।

प्रवासी समुदाय पर चर्च का केंद्रित ध्यान

पोप फ्रांसिस ने बीते वर्षों में प्रवासियों की समस्याओं को वैश्विक मुद्दा बताते हुए कहा था कि उन्हें नज़रअंदाज़ करना ‘गंभीर पाप’ है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए गोवा आर्कडायसिस अब हर साल ‘प्रवासी दिवस’ मनाता है।

पिछले वर्ष कैरान्जालेम के चर्च में आयोजित हिंदी मास में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि हिंदी भाषी कैथोलिकों की संख्या और जरूरत दोनों बढ़ रही हैं।

2025 तक कई चर्चों में नियमित हो गया हिंदी मास

गोवा–दमन आर्कडायसिस, जहां करीब 6.2 लाख कैथोलिक रहते हैं, अब महीने में कम से कम एक बार हिंदी में मास करवाता है।
पादरी डेरिक फर्नांडिस और फादर डोनाटो रोड्रिग्स बताते हैं कि कई पादरी हिंदी भाषा जानते हैं, जिससे अध्यात्मिक संदेश प्रवासी समुदाय तक बेहतर ढंग से पहुंच रहा है।

चर्चों में परंपरा और संवेदनशीलता का संगम

गोवा की चर्च परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन समय के साथ बदलती सामाजिक जरूरतों को देखते हुए यहां की धार्मिक संस्थाएं भी अधिक समावेशी बनती जा रही हैं।
हिंदी मास की बढ़ती स्वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि गोवा के चर्च न सिर्फ आस्था बल्कि विविधता का भी सम्मान कर रहे हैं।

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