कब होगी मॉनसून वाली बारिश? अब IMD देगा सटीक जानकारी, DRDO ने तैयार किया मेघसूचक


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मौसम विभाग को जल्द ही लिडार तकनीक मिलने वाली है, जिसके जरिये वह अपने पूर्वानुमानों को सटीक बना पाएगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने इसे विकसित किया है, जिसे मेघसूचक नाम दिया गया है। मौसम के पूर्वानुमान के लिए अभी तक राडार और उपग्रह के आंकड़ों पर ही निर्भरता बनी हुई है। अब लिडार तकनीक के इस्तेमाल से मौसम का सही-सही पूर्वानुमान करना आसान हो जाएगा। 

डीआरडीओ ने मौसम विभाग और नौसेना मुख्यालय के समक्ष मेघसूचक का प्रदर्शन किया है। डीआरडीओ का दावा है कि यह तकनीक सभी पैरामीटर पर खरी उतरी है। डीआरडीओ की देहरादून स्थित प्रयोगशाला इंस्ट्रूमेंट रिसर्च एंड डवलपमेंट इस्टेबलिसमेंट (आईआरडीई) ने इसे विकसित किया है। डीआरडीओ के सूत्रों के अनुसार इस तकनीक को जल्द ही मौसम विभाग को सौंपा जा सकता है।

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इस तरह करेगी काम

लिडार तकनीक में लेजर के जरिये बादलों एवं धूलकणों का आंकलन किया जाता है। इसमें एक लेजर बीम के जरिये किरणें बादलों एवं धूलकणों तक जाती हैं तथा उनसे टकराकर वापस लौटती हैं। यह प्रक्रिया एक सेकेंड के भीतर लाखों बार दोहराई जाती है। इसके बाद एक थ्री डीप मैप तैयार किया जाता है, जिसके जरिये बादलों एवं धूलकणों का सटीक आकलन किया जाता है जो मौसम के पूर्वानुमान में निर्णायक साबित होता है। इस तकनीक का इस्तेमाल उपग्रह, विमान या ड्रोन के जरिये किया जा सकेगा।

100 फीसदी सटीक होगा आकलन

लिडार तकनीक के जरिये किसी मौसम संबंधी घटना के समय का सौ फीसदी तक निर्धारण संभव हो सकेगा। मसलन, बारिश कितने बजे होगी, यह आकलन सौ फीसदी संभव होगा। विश्व की चुनिंदा मौसम एजेंसियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं।



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