Monday, May 25

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भाग गए बापू के बंदर — एक तंज भरी सच्चाई

लेखक: निर्मल असो

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आज का भारत महात्मा गांधी को सिर्फ उन क्षणों में याद करता है, जब कोई “बंदर” सार्वजनिक जीवन में उछलकूद मचा देता है। यह विडंबना ही है कि गांधी की विचारधारा पर चलने का दावा करने वाले लोग उन्हीं के आदर्शों की धज्जियां उड़ाते हैं। उनकी हत्या के दशकों बाद भी बापू की आत्मा कभी टीवी डिबेट में कठघरे में खड़ी कर दी जाती है, तो कभी नए-नए तर्कों की ढाल बनाकर उनके नाम का इस्तेमाल कर लिया जाता है।

गांधी के तीन प्रतीकात्मक बंदर—”बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो”—आज शायद खुद भ्रमित हैं। देश में बोलने वालों की फौज है, पर सुनने वाले नहीं। देखने को बहुत कुछ है, मगर सच को देखने की दृष्टि नहीं। कान लाखों हैं, पर सुनाने को जुबान कोई नहीं।

तीनों बंदर अब सोच रहे हैं कि क्या वे बूढ़े हो गए, या देश समय से पहले बूढ़ा हो गया? लोकतंत्र भी उसी तरह मौन, अंधा और बहरा होता दिख रहा है जैसे ये बंदर हाथ बांधे बैठे थे।

नए युग के तीन बंदर

एक दिन उन्होंने तय किया कि अब वे हाथों के ताले खोलकर भूमिका बदलेंगे।

पहला बंदर नेता बना।
उसने गांधी को याद तो किया, पर उसकी भाषा में नफरत थी, आंखों में विभाजन और कानों में केवल सत्ता का शोर।

दूसरा बंदर पत्रकार बन गया।
देश भ्रमण करते-करते उसने सत्ता पक्ष की भाषा सीख ली। वह अब वही सुनता है जो शीर्ष नेतृत्व कहे, और वही देखता है जो चुनावी मंच दिखाए।

तीसरा बंदर न्याय की चौखट पर पहुंचा।
वहां उसे बताया गया कि ज्यादा देखना, सुनना या बोलना अदालत की मानहानि हो सकता है, और अगर फिर भी न रुके तो देशद्रोह की धाराएं तैयार हैं।

हताश होकर तीनों लौटे और सोचने लगे कि जिस भारत के लिए बापू ने सपना देखा था, वह चल कैसे रहा है? उनके हाथों की विवशता अब असहनीय थी।

जब सिद्धांत बदल दिए गए

उन्होंने विद्रोह का मन बनाया, पर उन्हें अहसास हुआ कि अब उनसे पहले ही आवारा बंदर सड़क से सत्ता तक कब्जा जमा चुके हैं। उन्हें न आजादी की कीमत समझ में आई, न बलिदान का अर्थ। वे गांधी के साथ नहीं खड़े हुए थे, तो हत्या पर पश्चाताप करने की उम्मीद ही व्यर्थ थी।

अंततः गांधी के बंदरों ने अपने सिद्धांत बदल दिए। उन्होंने “बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो” का विचार त्यागकर सिर्फ इतना तय किया — “मत बोलो, मत सुनो, मत देखो।”
देश जैसे गांधी की स्मृतियों को भुलाना चाहता था, और बंदर इस काम में उत्तेजित होकर जुटे थे।

आज गली-कूचों से संसद तक बंदरों की चीखें गूंज रही हैं। कहीं कोई सुनवाई नहीं, कहीं कोई दृष्टि नहीं। गांधी के बंदर अब चुप हैं, लेकिन उछलकूद करने वाले बंदरों की जय-जयकार जारी है।

चिंतन का समय

यह व्यंग्यात्मक चित्रण सिर्फ कटाक्ष नहीं, एक चेतावनी है। अगर राष्ट्र सुनना, देखना और सच कहना भूल जाए तो गांधी का नाम लेने भर से लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।
प्रश्न यही है — क्या हम अब भी बापू के बंदरों को याद रखेंगे या उन्हें भी इतिहास से बाहर धकेल देंगे?


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