
हम जिस भारत के रूप में उभरे हैं और जिस भारत की हम अभी भी तलाश कर रहे हैं

– डॉ. प्रियंका सौरभ

नई दिल्ली। (सद्वार्ता) प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस हमें अपने राष्ट्र के अतीत पर चिंतन करने और भविष्य पर विचार करने का अवसर देता है। स्वतंत्रता के 80 वर्षों में भारत में आए बदलाव केवल अर्थव्यवस्था, शहरों और तकनीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम भारतीयों की आकांक्षाओं, आत्मविश्वास और सोच में भी व्यापक परिवर्तन आया है। आज का भारत 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए भारत से काफी अलग है।
आर्थिक विकास से बदली तस्वीर
स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में संसाधनों की कमी, सीमित अवसर और बड़ी आबादी की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना बड़ी चुनौती थी। आज भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल है। आधुनिक उद्योग, विकसित होती आधारभूत संरचना, उद्यमिता और महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी देश की नई पहचान बन चुके हैं।
सड़क, हवाई अड्डे, मेट्रो, डिजिटल नेटवर्क और बेहतर कनेक्टिविटी ने देश के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है। आज एक युवा ऑनलाइन पढ़ाई कर सकता है, दूसरे शहर की कंपनी में काम कर सकता है और पूरे देश में सेवाएं देने वाला व्यवसाय भी चला सकता है।
तकनीक ने खोले नए अवसर
भारत के परिवर्तन में तकनीक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। मोबाइल फोन अब सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि बैंक, कक्षा, बाजार, कार्यालय और सूचना का प्रमुख स्रोत बन चुका है। ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं ने आम लोगों के जीवन को आसान बनाया है।
हालांकि, प्रगति का वास्तविक पैमाना केवल तकनीक नहीं, बल्कि यह है कि तकनीक आम नागरिक के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव ला रही है।
भारतीयों में बढ़ा आत्मविश्वास
भारतीय नागरिकों और राष्ट्र के आत्मविश्वास में भी बड़ा बदलाव आया है। कभी पश्चिमी देशों के प्रति प्रशंसा और हीनभावना देखने को मिलती थी, लेकिन आज भारतीय युवा खुद को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोगों के बराबर मानते हैं।
विज्ञान एवं तकनीक, उद्यमिता, पेशेवर क्षेत्र, कला और खेल सहित विभिन्न क्षेत्रों में भारतीयों ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। साथ ही भारतीय संस्कृति, भाषाओं, परंपराओं और इतिहास के प्रति भी नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है।
विकास के साथ चुनौतियां भी कायम
प्रगति के बावजूद देश की सभी समस्याएं समाप्त नहीं हुई हैं। विश्वस्तरीय हवाई अड्डों और डिजिटल सुविधाओं के साथ आज भी कुछ समुदाय स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता जैसी बुनियादी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
देश में बेहतरीन व्यवसाय और कुशल श्रमशक्ति मौजूद है, लेकिन लाखों युवा अभी भी स्थायी और बेहतर रोजगार की तलाश में हैं। शहरों का विकास हुआ है, लेकिन प्रदूषण, यातायात और खराब शहरी नियोजन जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं। आर्थिक विकास ने अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन उसका लाभ सभी नागरिकों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है।
आलोचना भी सच्ची देशभक्ति का हिस्सा
देश की कमियों को स्वीकार किए बिना उससे सच्चा प्रेम संभव नहीं है। सच्ची देशभक्ति हमें उन चीजों को स्वीकार करने का साहस देती है, जिनमें बदलाव की जरूरत है। मजबूत लोकतंत्र में असहमति और आलोचना के लिए भी जगह होनी चाहिए।
राष्ट्रीय हित केवल आर्थिक विकास, सैन्य शक्ति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। सामाजिक सद्भाव, मजबूत संस्थाएं, समान अवसर, नागरिकों की गरिमा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
विविधता भारत की ताकत
भारत केवल आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के इतिहास, विभिन्न परंपराओं, भाषाओं, दर्शनों और सांस्कृतिक प्रभावों से समृद्ध सभ्यता है। विविधता को स्वीकार करना भारत की विशेषता रही है।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी सभ्यतागत पहचान को बनाए रखते हुए तेजी से बदलती दुनिया की नई संभावनाओं को भी स्वीकार करें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि
एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में लोकतंत्र को कायम रखना और विकसित करना शामिल है। विभिन्न भाषाओं, धर्मों, क्षेत्रों और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से भरा देश संविधान की व्यवस्था के भीतर अपने मतभेदों को सुलझाता आया है।
भारतीय लोकतंत्र अभी पूर्ण नहीं है, लेकिन असहमति को कमजोरी के बजाय ताकत के रूप में देखा जा सकता है। जरूरी है कि मतभेद विभाजन में न बदलें और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भारत की मूल भावना को कमजोर न करे।
भविष्य का भारत कैसा हो?
आने वाले भारत का मूल्यांकन केवल आर्थिक आंकड़ों और बड़ी परियोजनाओं से नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और पर्यावरण की गुणवत्ता से भी होगा। युवाओं को अवसर देना, अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, सार्वजनिक संस्थाओं को मजबूत करना और समावेशी विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है।
यदि हर युवा भारतीय को सीखने, काम करने और देश के विकास में योगदान देने का समान अवसर मिले, तो भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश देश के लिए बड़ी ताकत बन सकता है।
अभी सफर बाकी है
भारत ने एक नवस्वतंत्र देश से लेकर आर्थिक, तकनीकी और सामरिक क्षमताओं वाले राष्ट्र तक का लंबा सफर तय किया है। लेकिन यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। अगली चुनौती केवल अधिक समृद्ध और शक्तिशाली बनने की नहीं, बल्कि अधिक न्यायपूर्ण, एकजुट और आत्मविश्वासी भारत बनाने की है।
हमारे पूर्वजों ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी। अब हमारा कर्तव्य है कि आने वाली पीढ़ियों को अधिक अवसर और अपनेपन की भावना दें। हमें ऐसा भारत बनाना है जो समृद्ध हो लेकिन संवेदनहीन न हो, शक्तिशाली हो लेकिन अहंकारी न हो, आधुनिक हो लेकिन अपनी जड़ों से न कटे और विविधतापूर्ण हो लेकिन विभाजित न हो।
भारत का 80वां स्वतंत्रता दिवस हमारी उपलब्धियों का उत्सव होने के साथ-साथ यह याद दिलाने का अवसर भी है कि अभी लंबा सफर बाकी है। हमें जो भारत मिला है, वह कई पीढ़ियों के त्याग और प्रयासों का परिणाम है। आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा भारत छोड़कर जाते हैं, यही हमारे योगदान का वास्तविक मापदंड होगा।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)


