RNI N. MPHIN/2013/52360; प्रधान संपादक - विनायक अशोक लुनिया

पराई वस्तु पर राग भरी दृष्टी भी डाली तो वह चोर है,उत्तम आकिंचन्य तो वृह्म का प्रवेश द्वार है:मुनिश्री

विदिशा से सह संपादक शोभित जैन की रिपोर्ट।

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दैनिक राशिफल दिनांक 13 जुलाई (बुधवार) 2022 https://sachchadost.in/archives/93913

“जिस शरीर में हुं वो भी मेरा नहीं है, जिस शरीर से में बोल रहा हूं बो में नहीं हुं।जो बस्तु जैसी है उस उस बस्तु को उसी अवस्था के अनुसार स्वीकार करना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री सुप्रम सागर जी महाराज ने प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि जब सारा जगत क्रोध अहंकार और लोभ से भरा हुआ है वंहा पर सत्यता का भाष कैसे हो सकता है?और जंहा पर सत्यता का ही भाष नहीं,वंहा पर शुचिता नहीं आ सकती, जंहा शुचिता नहीं है, वंहां पर उत्तम आकिंचन्य धर्म नहीं आ सकता। उन्होंने कहा कि उत्तम आकिंचन्य धर्म को प्राप्त करना है तो अपने आपको अपनी आत्मा में रमना पड़ेगा, अपनी आत्मा में रमने का जो आंनद है उसे वही प्राप्त कर सकता है जिसने पांच पापों का त्याग करते हुये संसार की सभी बस्तुओं से राग द्वेष और मोह को छोड़ दिया है। उत्तम आकिंचन्य तो वृह्म का प्रवेश द्वार है, इसका आनंद तो कोई निर्ग्रंथ ही उठा सकता है। भले ही पंचम काल में मोक्ष का द्वार नहीं खुला है लेकिन यह भी सत्य है कि किसी भी काल में अरिहंत का मार्ग खुलेगा तो वह उत्तम आकिंचन्य धर्म के द्वारा ही खुलेगा।उन्होंने एक कथानक सुनाते हुये कहा कि राजा के आदेश पर एक स्थान पर सिक्का जमा किये जा रहे थे जिस पर आपको अपना चिंह लगाकर सिक्का जमा करना था पुन्हा आदेश दिया गया कि सभी लोग अपने चिंह को पहचान कर अपना अपना सिक्का उठा लें सभी सिक्के एक से है एक ही वजन के है, लेकिन यदि आपने अपना सिक्का न उठाकर दूसरे का सिक्का उठा लिया तो वह चोरी कहलाऐगी। मुनि श्री ने कहा कि पराई वस्तु पर राग भरी दृष्टी भी डाली तो वह चोर है।आप लोग पराई बस्तु पर कितनी दृष्ठी डालते है? इस पर स्वं ही विचार करना?उन्होंने कहा कि एक साधक भी वर्षों वर्ष तपस्या करता है,जब तक वह शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान को नहीं समझता तब तक वह भी उत्तम आकिंचन्य धर्म में प्रवेश नहीं कर पाता तो रागी द्वैषी और मोही व्यक्ती कैसे प्रवेश कर पाऐंगे?
जैसे एक दीपक है , वह विना राग द्वेष के हर बस्तु को दिखाता है लेकिन वह उस बस्तु अनुसार वैसा वनेगा नहीं, उसी प्रकार मोक्षमार्ग में आप वाहर से ज्ञान तो प्राप्त कर सकते है, लेकिन दीपक के समान स्वपर प्रकाशित होंना पड़ेगा जिसे दीपक का प्रकाश चाहिये तो उससे दूर रहना होगा पास में जाओगे तो जल जाओगे, उसी प्रकार आत्मा को प्रकाशित करना है तो अपने आप में रहना होगा तभी वह आत्मा प्रकाशित हो पाऐगी यदि तनिक भी आत्मा से वाहर गये तो राग द्वैष की झंझाबात उस आत्मा रूपी दीपक को वुझा देगी। दीपक तभी तक दीपक है जव तक उसके साथ बाती और तैल का संयोग है।देह भिन्न है ज्योती भिन्न है,साधना में तल्लीन साधू को तो एकांत ही अच्छा लगता है और जिसको एकांत अच्छा लगता है वह ही अपने लक्ष्य को हांसिल कर पाता है। श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि उत्तम आकिंचन्य धर्म के दिन शिवरार्थीओं ने जो विगत आठ दिन में अध्यन किया उसकी लिखित परिक्षा मुनिसंघ के सानिध्य में संपन्न हुई। दशलक्षण धर्म का अंतिम दिवस
उत्तम वृहम्चर्य धर्म का अंतिम दिवस है। अर्थात अनंत चतुर्दशी के दिन दि. जैन छोटा मंदिर किला अंदर से दौपहर ढाई वजे श्री जी की शोभायात्रा निकाली जाऐगी जो कि जय स्तंभ चौक वजरिया से लोहा बाजार वड़ा बाजार चौराहे से बापिस किलाअंदर पेड़ी चौराहा होते हुये दि. जैन छोटा मंदिर पहुंचेगी जंहा भगवान का अभिषेक एवं दशलक्षण पूजन संपन्न होगी।
दि. जैन छोटा मंदिर पंचायत एवं श्री सकल दि. जैन समाज ने सभी धर्म प्रेमी वंधुओं से श्री जी की शोभायात्रा में शामिल होंने की अपील की है।

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