RNI N. MPHIN/2013/52360; प्रधान संपादक - विनायक अशोक लुनिया

सुख चाहते हो तो आकुलता व्याकुलता और संकलेशता को छोड़ना होगा:मुनिश्री

“आजकल प्रत्येक व्यक्ती खाने पीने में, घर गृहस्थी में, व्यापार में, अपने परिणामों को इतना अधिक आकुल व्याकुलता कर लेता है,कि वह बस्तु को प्राप्त करने के बाद भी उसकी आकुलता नहीं मिटती, वल्कि और और बड़ती ही जाती है, इसलिये जब भी वह मंदिर में या घर में स्वाध्याय करने बैठता है तो वंहा पर भी निराकुल नहीं रह पाता इससे उसे अपनी आत्मा की स्वानुभूति कम और श्र्वानभूती ज्यादा होती है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने अरिहंत विहार जैन मंदिर में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने कहा कि आजकल आत्मा का हित भोगों में, इन्द्रियों के सुख में तथा परद्रव्यों में मान लिया है, आत्मा का सुख कंही बाहर नहीं है आत्मा का सुख कंहीं दूसरे स्थान पर नहीं मिलेगा आत्मा का सुख तो आपको आपकी अपनी आत्मा में ही खोजना होगा उसी का नाम स्वानुभूती है। मुनि श्री ने कहा कि मोक्ष का मार्ग तो एक ही है, कोई दो मोक्षमार्ग नहीं कि निश्चय का अलग हो और व्यव्हार का अलग हो ऊपर चड़ने के लिये जो सीड़ी लगाई गयी है वह व्यव्हार है तथा ऊपर चड़ने के बाद उस सीड़ी का त्याग करना निश्चय मोक्षमार्ग है। विना मार्ग के मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता जो मार्ग पर चलेगा वही मंजिल तक पहूंच पाऐगा। घर में रहकर के आत्मा का कल्याण हो नहीं सकता घर में कयी विषमताऐं और आकुल व्याकुल परिणाम होते है, आत्मा के कल्याण के लिये तो आपको उस राह पर चलना होगा जिस राह पर भगवान ऋषभदेव चले भगवान महावीर चले आचार्य भगवंत चले मुनि श्री ने कहा कि चाह तो सभी की है कि सभी को सुख मिल जाऐ लेकिन सुखी होंने की जो राह है उस राह पर चलना होगा जंहा पर चाह और राह एक हो जाऐ तो आपकी राह आसान हो जाऐगी।
मुनि श्री ने कहा कि सुख चाहते हो तो आकुलता व्याकुलता और संकलेशता को छोड़ना होगा।
मुनि श्री ने कहा कि निश्चय और और व्यव्हार दौनों ही सत्य भूतार्थ है,एकांत से किसी एक को भी झूंठा मत कह दैना। “संसार में झूंठ नाम की कोई बस्तु है ही नहीं” जो झूंठ बोल रहा है वह भी उस झूंठ की आपेक्षा से सत्य है, उन्होंने कहा कि कभी अदालत में झूंठ बोलने बाले गवाह ने अदालत में गवाही देते समय यह कहा कि वह असत्य बोल रहा है?.. भले ही वह झूंठी गवाही दे रहा है,उसी प्रकार तत्वों का निर्णय इतना सरल नहीं है कि आप किसी एक पक्ष को झूंठा कह दो एकांत से आप किसी को मिथ्या कह सकते हो लेकिन जव आप स्यादवाद से कथन करते हो तो उस आपेक्षा को लगाना ही न्यायोचित एवं सत्य होगा। उन्होंने कहा कि मोक्ष मार्ग दो नहीं है, मोक्षमार्ग तो एक ही है, हमारी दृष्टि का फर्क है। उन्होंने कहा कि हे मां आपने पिता का घर इसलिये छोड़ा था कि पति आपका भला करेगा और जब पति भला न कर पाया तो आपने वेटे पर विश्वास किया उसी प्रकार हमने पर दृव्यों को ही तो अपना माना है और
इसी में ही सारा जीवन निकल जाता है लेकिन स्वानुभूति नहीं हो पाती।मुनि श्री ने कुत्ते के जीव का उदाहरण देते हुये कहा कि आप सभी ने देखा होगा उस श्र्वान को वह श्र्वान इधर उधर की गंध को गृहण करता है, यदि मल विसर्जन भी करना है तो पहले उस स्थान को सूंघता है,यही श्र्वानुभूती है। भले ही हम कहते आऐ है कि पर की मुझमें कोई गंध नहीं, लेकिन पर दृव्यों में ही अपनी आत्मा की खोज करने में लगा हुआ है।
उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया कि 12 जुलाई को अरिहंत विहार जैन मंदिर में चातुर्मास कलश की स्थापना होगी बाहर से बड़ी संख्या में मुनिसंघ के भक्त श्रद्धालुओं के आनी की संभावना है।

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