सूर्य के उतरायण का पर्व है मकर संक्रान्ति

दान-पुण्य व पवित्र नदियों में स्नान का रहता है विशेष महत्व

  हिंदू धर्म में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। जो हमें प्रतिदिन साक्षात् दर्शन देते है तथा सम्पूर्ण जगत में ऊर्जा का संचार करते हैं, उनमें नया उल्लास व जीवन भरते है । पुथ्वी पर जितने तरह के भी प्राणी वास करते हैं वो सभी जीव सूर्य देव की शक्ति से ही संचालित होते हैं। इसके अलावा भारतीय ज्योतिष में सूर्य को नवग्रहों का स्वामी माना गया है। मान्यता है कि सूर्य अपनी नियमित गति से राशि परिवर्तन करता है। सूर्य के इसी राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। इस तरह प्रतिवर्ष 12 संक्राति तिथियां पड़ती हैं। जिनमें से मकर संक्रांति का सबसे अधिक महत्व माना गया है।
      सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश को मकर संक्रांति अथवा उतरायण के रूप में मनाया जाता है । जिसे उतरायण पर्व के साथ-साथ देश अलग-अलग भागों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है । प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति का पर्व मनाया जाता है ।

उतरायण पर अलग-अलग नाम से पर्व
  मकर संक्रांति का दिन बहुत शुभ और विशेष माना जाता है। इस दिन पूरे भारत देश में विभिन्न राज्यों में कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है. इस दिन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है. चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है. तिल और गुण के दान की परंपरा भी है ।  गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति को उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दिन दोनों ही राज्यों में बड़े धूम से पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है । आंध्रप्रदेश में संक्रांति नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है. वहीं तमिलनाडु में संक्रांति को पोंगल, महाराष्ट्र में भी इसे मकर संक्रांति या संक्रांति के रूप में मानते है । वहीं दक्षिण भारत में इसे पोंगल और असम में बिहू के नाम के त्योहार मनाने की परंपरा है। साथ ही पंजाब में संक्रान्ति पर लोहडी पर्व बड़े धूमधाम व हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है ।

मकर सक्रान्ति और पौरोणिक मान्यताएं
  मकर संक्रान्ति के दिन से देश में दिन बड़े और रातें छोटी होना शुरू हो जाती हैं। शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है। सूर्य की उत्तरायण स्थिति को देवताओं का दिन कहा जाता है। इस काल में लोग देवों के आशीर्वाद से नई ऊर्जा और उत्साह से सभी मनोरथ पूरे करते हैं। शास्त्रों के अनुसार सूर्य जब दक्षिणायन में रहते हैं तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छह माह को दिन कहा जाता है. दक्षिणायन को नकारात्मकता और अंधकार का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता एवं प्रकाश का प्रतीक माना गया है । यही वजह है कि सूर्य की उतरायण स्थिति में ही अधिकांश शुभ कार्य, मुहुर्त आदि सम्पन्न होते है ।
  सनातन मान्यताओं के मुताबिक मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं. चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं, उनके घर में सूर्य के प्रवेश मात्र से शनि का प्रभाव क्षीण हो जाता है । एक अन्य पौराणिक प्रसंग के अनुसार भीष्म पितामह महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे । उन्होंने मकर संक्रान्ति पर पही अपने प्राण त्यागे थे । यह भी मान्यता है कि इस दिन मां यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था ।

मकर सक्रान्ति और पतंगोत्सव
  मकर संक्रांति पर लोकपरंपरा अनुसार विभिन्न राज्यों में पतंगोत्सव का आयोजन किया जाता है । जहां उतरायण पर युवा साथियों व बच्चे द्वारा बढ़-चढ़कर भाग लिया जाता है । पतंगोत्सव में पतंग उडाने को लेकर कई प्रतियोतिाओं का आयोजन किया जाता है । पर्व को बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है ।

मकर संक्रांति पर नदी स्नान व दान का महत्व
  मकर संक्रान्ति पर नदी में पवित्र स्नान व दान का विशेष रहता है । पदम पुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होने के दिन अर्थात् मकर संक्रांति के दिन दान-पुण्य का बहुत महत्व होता है । मकर संक्रांति के दिन सूर्याेदय से पहले स्नान करना चाहिए. ऐसा करने से दस हजार गौदान का फल प्राप्त होता है । इस दिन ऊनी कपड़े, कम्बल, तिल और गुड़ से बने व्यंजन व खिचड़ी दान करने से भगवान सूर्य एवं शनि देव की कृपा प्राप्त होती है । मान्यता है कि मकर संक्रांति पर सूर्य की साधना और इनसे संबंधित दान करने से सारे शनि जनित दोष दूर हो जाते हैं । इस दिन गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों में स्नान करना विशेष फलदायी व शुभ माना जाता है।

मुकेश बोहरा अमन

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