रौशन हो संपूर्ण जहान

भारतवर्ष अयोध्या-सम हो, हर बालक हो राम-समान।
धर्म विजित हो, नाश बुराई का सदैव हो, हे भगवान!

सीता-सी हो सहनशीलता, लक्ष्मण-सा बंधुत्व अमर।
भरत और शत्रुघ्न-सरीखा हो वैरागी हृदयांतर ।।

हनुमत-सी हो सेवा-भक्ति, शक्ति, संकट हरने का गुण।
धुल जाए प्रभु-स्मरण-सलिल से मन पर जमी धूल,अवगुण।।

अग्नि स्वार्थ की बुझ जाए, जग के हितार्थ हो गुंजित गान।
प्रेम भाव हो मनुज-मनुज में, नारी का हो नित सम्मान।।

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सूर्य-रश्मियाँ ज्यों कर जाती हैं, ज्योतिर्मय निखिल जहान।
वैसे ही विस्तीर्ण धरा पर हो सुबुद्धि, हितकारी ज्ञान।।

अत्याचार मिटे जग से, हो नष्ट हृदय से रिपु अभिमान।
जले दीप मानव-संस्कृति का, रौशन हो संपूर्ण जहान।।

डॉ०कुमारी रश्मि प्रियदर्शनी
कवियित्री सह असिस्टेंट प्रोफेसर
डिपॉर्टमेंट अॉफ इंग्लिश
गौतम बुद्ध महिला कॉलेज, गया
(मगध विश्वविद्यालय, बोधगया)

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